गांधीजी के देश में इतनी गालियां?

कहा जाता है, जहां शब्द नाकाम हो जाते हैं, वहां गालियों की जरूरत पड़ती है। अच्छे लोगों के पास दूसरों को देने के लिए दुआएं होती हैं, पर कौन लोग हैं, जिनके पास दूसरों के लिए केवल गालियां होती हैं। दरअसल, जिसके पास या जिस समाज के पास जो चीज होगी, वह वही देगा। अगर आपके पास गालियां हैं, तो आप वही देंगे। गालियों का कोई व्याकरण या गणित नहीं है। गालियां ऐसी शब्द रचनाएं हैं, जिन्हें साहित्य में भी सम्मान से शामिल नहीं किया जाता है।

आखिर गालियों को सम्मान क्यों नहीं मिलता? क्या गालियों को सम्मान मिलना चाहिए? क्या गालियों को सामान्य मान लेना चाहिए? ऐसे सवालों से पहले हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या स्कूल के कोर्स में गालियों को शामिल कर लिया जाए? क्या शिष्य अपने शिक्षक-शिक्षिका को और शिक्षक-शिक्षिका अपने शिष्य को गालियां देने लगें? क्या पिता अपने पुत्र को और पुत्र अपने पिता को गालियां देने लगें? यहां हम मां या बहन तक नहीं जाएंगे, पर सच यही है कि कुछ बहु-प्रचलित गालियां मां और बहन शब्द से सज्जित होती हैं।

क्या कार्यालय में अफसरों को गालियां देने का अधिकार होना चाहिए? क्या कोई कर्मचारी ऑफिस पहुंचकर गालियों से अपने अधिकारी का अभिवादन कर सकता है? क्या कारपोरेट वर्ल्ड का कोई बॉस भरी मीटिंग में अपने किसी छोटे अधिकारी से कोई गाली सहर्ष स्वीकार कर सकता है? ज्यादातर जगह गालियों से प्रमोशन रुक सकता है और नौकरी भी जा सकती है?

यहां यह ध्यान देने की बात है कि गालियां एकतरफा होती हैं। जो शक्तिशाली होता है, उसी को गालियां देने का हक दिया जाता है। कोई किसान अगर किसी जमींदार को गालियां बकने लगे, तो हड्डियां टूटने की नौबत आ जाएगी। आपके घर आने वाली कामवाली बाई अगर काम शुरू करते ही गालियां बकने लगे, तो आपको कितनी खुशी होगी? रिश्वत लेने-देने वाले परस्पर गालियां बकने लगेंगे, तो क्या होगा? सिफारिशी पत्र लेकर नौकरी के लिए पहुंचा युवा गालियां देने लगे, तो क्या उसे नौकरी मिलेगी?

दरअसल, गालियां सामान्य नहीं है। गालियां बेलगाम शक्ति प्रदर्शन हैं। ऐसे शक्ति प्रदर्शन का अधिकार हर किसी को नहीं है। जो शक्तिशाली होगा, उसे गालियां बर्दाश्त नहीं होंगी और जो कमजोर होगा, उसे गालियां बर्दाश्त करनी पड़ेंगी।

मतलब, गालियों के साथ एक पूंजीवाद चलता है। यहां समाजवाद या साम्यवाद की कल्पना मुमकिन नहीं है। गालियां कभी भी बराबर-बराबर नहीं पड़ती हैं। जहां तक गांधीवाद की बात है, तो वहां गालियों के बारे में आप सोच भी नहीं सकते। क्या गालियों को सत्य माना जाए? कतई नहीं, ज्यादातर गालियां अपने अर्थ और भाव, दोनों में असत्य होती हैं। क्या गालियों को अहिंसा माना जाए? कतई नहीं, यह तो कोई भी बता देगा कि गालियां हिंसा का हिस्सा हैं। क्या गालियों को प्रेम माना जाए? गालियां आमतौर पर घृणा, दुत्कार, क्रोध की उपज हैं। गांधी जी अगर गालियां सुनते, तो सत्याग्रह छेड़ देते या उपवास पर बैठ जाते।

अब कुछ लोग कहते हैं कि हमारी संस्कृति में गालियां हैं। हमारे कुछ संस्कारों और कर्मकांडों में गालियां हैं। ऐसे लोग, गलत बात करते हैं। शादी-विवाह के अवसर पर जो गालियां गाई जाती हैं, उनमें छेड़छाड़, उलाहना या ध्यान खींचने की भावना प्रबल होती है। ध्यान रहे, यहां भी गालियां एकतरफा हैं। महिलाएं गालियां देती हैं और पुरुष सुनते हैं। अगर शादियों में पुरुष मिलकर महिलाओं को संबोधित गालियां गाने लगें, तो क्या होगा? यहां यह समझना जरूरी है कि शादी के माहौल को मनोरंजक बनाने के मकसद से ही गालियों का प्रयोग होता है और इन गाए जाने वाली गालियों में भी एक गरिमा होती है। मां-बहन की प्रचलित गालियों से बिल्कुल अलग शादियों के गीत मनोरंजक होते हैं। शादियों में अभी मां-बहन की गालियों का समावेश नहीं हुआ है और न कभी हो पाएगा।

ध्यान देने की बात है कि शादियों में भी हर महिला गाली गीत नहीं गाती है। एक बड़े परिवार में चंद महिलाएं ही होती हैं, जिनमें इन गीतों को गाने का साहस होता है। परिवार की ज्यादातर महिलाएं ऐसे गीत गाते हुए हिचकते हैं, उन्हें कमजोरी का एहसास होता है। ऐसे में, जो दबंग या शक्तिशाली महिलाएं होती हैं, उन्हें ही आगे बढ़कर स्वागत में गाली गीत गाते देखा जाता है।

ध्यान रहे, जंतर-मंतर पर कोई गालियां नहीं गा रहा था। यह भी विशेष बात है कि पहली बार पुरुष नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाओं या लड़कियों को भद्दी गालियां देने का मौका दिया गया। वहां दी गई जहर बुझी गालियां शायद स्मृति पटल पर हमेशा बनी रहेंगी। लोग अच्छे शब्दों को भूल जाते हैं, पर बुरे शब्द हमेशा के लिए याद रह जाते हैं। यही इस देश के साथ हुआ है।

जो लोग ऐसी गालियों को न्यायोचित या यथोचित ठहरा रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना होगा कि गाली खिलाने वालों को अक्सर गालियां खानी पड़ती हैं। बहुत सारे लोग यह कहकर भी गालियों का बचाव कर रहे हैं कि चूंकि वर्तमान सत्ताधारी समुदाय और उसके समर्थक गालियां बकते रहे हैं, इसलिए उन पर भी गालियां बरसनी चाहिए। यह गालियों का बदला बहुत भारी पड़ने वाला है और इसकी राजनीति ही नहीं, इससे बनने वाले समाजशास्त्र को भी समझना जरूरी है।

ध्यान रखना होगा, गाली एक मान्य अभिव्यक्ति या शक्ति भले बन जाए, पर संस्कृति न बने। जो जेन-जी आज गालियों को अपने स्वभाव में धड़ल्ले से शामिल कर रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना होगा कि उनका आगे कैसी पीढ़ियों से सामना होगा। ध्वनि से प्रतिध्वनि तय है।

देश को तो बस इतना ध्यान रखना होगा कि राम-राम कहने से राम आएंगे और रावण-रावण कहने से रावण ही आएगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *