यह बात वामपंथी भी मानते हैं और अपने मुखपत्रों में लिख-छाप चुके हैं कि ‘कॉकरोच इसलिए भी जीते, क्योंकि बदतमीज थे’। कॉमरेडों को शायद यह लगने लगा है कि बदजुबानी भी एक मुकम्मल जवाब हो सकती है। क्या गालियों की बौछार से सरकारों को डराया जा सकता है? शायद हां।
दरअसल, सरकारी दफ्तरों में बैठे ज्यादातर लोग जानते हैं कि सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसलिए एक डर तो उनके मन में पहले से ही रहता है। इसलिए जब भी कोई नाराज नागरिक विरोध में थोड़ी भी प्रयोगधर्मिता दिखाता है, तो भ्रष्ट लोगों के हाथ-पांव फूलने लगते हैं। ऐसा आगे भी होगा, अत: समय रहते सुधार कर लेना ही बेहतर है।
अभिजीत दिपके और नेहा बोरा
बहरहाल, कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में दो चेहरे ज्यादा चमके हैं। एक चेहरा तो अभिजीत दिपके का है और दूसरा नेहा बोरा का। अब सवाल यह है कि ये दोनों आगे आंदोलनजीवी बने रहने में ही अपनी भलाई समझेंगे या चुनावी मैदान में भी उतरेंगे?
लोकतंत्र में आपको अंतत: एक बड़े परिवर्तन के लिए चुनावी मैदान में उतरना ही पड़ता है। ना ना करते अरविंद केजरीवाल भी चुनाव मैदान में उतरे थे और सत्ता मोह ऐसे जागा कि जेल में रहते हुए भी उन्होंने मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा।
खैर, अभिजीत दिपके क्या चुनाव जीतने के लिए भी गालीबाजी का सहारा लेंगे? क्या गालियों की बौछार से वोटों की बरसात हो पाएगी? चुनाव मैदान में नेताओं की भाषा कुछ बेहतर हो जाती है, पर अगर कॉकरोच जनता पार्टी से प्रभावित चुनाव हुआ, तो चुनावी रैलियों में अपशब्द भी खूब मिलेंगे। ऐसे-ऐसे बैनर मिलेंगे, जिन्हें अखबार वाले चाहकर भी छाप नहीं पाएंगे? एक बारगी गालियां बहुत से लोगों को अच्छी भी लगी हैं, पर अगर चुनावी मैदान में लगातार गालियां बकी जाएंगी, तो पता नहीं, कब तक लोग सुनना या झेलना चाहेंगे?
यहां ध्यान देने की बात है कि चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। अभिजीत को बहुत मेहनत करने की जरूरत पड़ेगी। वैसे, वह तभी चुनावी मैदान में उतरेंगे, जब कुछ दूसरी बड़ी पार्टियां उनके साथ परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से खड़ी होंगी। या हो सकता है, वह पहले एक दबाव समूह के रूप में अपने कद को बढ़ाएंगे और उसके बाद चुनावी रण में आएंगे। उन्हें ध्यान रखना होगा कि चुनावी हार बहुत जोर से जमीन पर पटकती है।
अब रही बात नेहा बोरा की। उनके राज्य उत्तराखंड में कॉमरेड राजा बहुगुणा के बाद कोई चर्चित वामपंथी नहीं है। देवभूमि कहलाने वाले राज्य में वामदल 10 या 12 सीटों पर चुनाव लड़ते हैं और एक प्रतिशत वोट भी नहीं बटोर पाते हैं। नेहा बोरा जिस तरह से उमर खालिद की पैरोकारी करती हैं, उन्हें जमीनी आधार पर उत्तराखंडियों का दिल जीतने के लिए कठिन परिश्रम से गुजरना होगा।
वह वामपंथी छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष हैं और उनकी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन क्रांति की पक्षधर है। इस पार्टी के बिहार और कर्नाटक से कुल दो लोकसभा सांसद हैं और बिहार से एक विधायक हैं। नेहा बोरा को चुनाव लड़ने के लिए किसी ऐसे राज्य में जाना पड़ेगा, जहां इंडिया ब्लॉक मजबूत है।
हालांकि, उनका सामना भाजपा और अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक से भी होगा। इन दोनों को वह ‘ब्रुटल’ अर्थात क्रूर कहती हैं। वह अपने हर विरोधी के लिए भाजपा और आरएसएस के गुंडे शब्द का इस्तेमाल पुरजोर करती हैं। अच्छा भाषण देती हैं या वही बोलती हैं, जो उनकी पार्टी लाइन है। यहां राजनीति में एकदम किनारे खड़े कॉमरेडों की मुख्यधारा मीडिया से शिकायत को भी समझा जा सकता है। यह शिकायत नेहा बोरा के स्वभाव का हिस्सा है, तो आश्चर्य नहीं।
स्याही वाला गुंडा
हालांकि, यह सवाल उन्हें खुद से पूछना चाहिए कि गुंडे किस पार्टी में नहीं हैं। 34 साल सत्ता में रहकर पश्चिम बंगाल में जो हिंसक वाम संस्कृति बनी, वह कतई आश्चर्य की बात नहीं है। चुनाव बाद कितने लोग मारे जाते थे, यह भी सब जानते हैं। हां, बंगाल में अभी विरोधियों पर अंडे फेंकने की ब्रुटलिटी या क्रूरता जरूर हो रही है! वैसे, कुछ न सही, तो स्याही फेंकने को ही क्रूरता करार दिया गया है। क्या गुंडे अब स्याही छिड़कने का काम करने लगे हैं?
वैसे, केरल एक ऐसा राज्य है, जहां गुंडा शब्द खूब इस्तेमाल होता है। आरएसएस और वाम के बीच एक तरह से राजनीतिक-सांस्कृतिक युद्ध के हालात हैं। खुद सरकारी या सियासी आंकड़ों के अनुसार, वहां साल 2000 से 2017 के बीच अगर 85 कॉमरेड मारे गए, तो 65 संघी भी मारे गए। वहां दोनों एक दूसरे को गुंडा कहते हैं। यह गुंडा शब्द केरल से आता है, पर यह मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली में कम ही इस्तेमाल होता है।
बहरहाल, नेहा बोरा की राजनीतिक पार्टी भाकपा (माले) लिबरेशन को अच्छे से पता होगा कि लेनिन के समय सोवियत संघ में करीब 12 लाख लोग मारे गए थे और चीन में माओ के समय करीब 16 लाख लोग तो केवल सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर मारे गए थे। देश वामपंथी हो या इस्लामी, ब्रुटलिटी का सच वामपंथियों से बेहतर कौन जाता है?
नेहा बोरा को देखकर लगता है, अपने देश में दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच संघर्ष का तेज होना तय है। देश में वामपंथी अकेले तो अब बड़ी राजनीतिक शक्ति कभी नहीं बनेंगे, पर भाजपा विरोधी गठबंधनों की ताकत उन्हें मजबूती देगी। किसी की पीठ पर चढ़कर ही मंजिल मिलेगी।
बेशक, थियेटर से गुजरती हुई राजनीति में आई नेहा बोरा उम्मीद जगाती हैं, लेकिन उनका सफर लंबा है। लंबे सफर में केवल जुमले काम नहीं आएंगे। वाम नीतियों की कुछ उलझती पहेलियों को भी सुलझाना होगा। उन्हें अपने परिवार और समाज को साथ लेकर चलना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो काफी आगे निकल गया है, पर क्या कॉमरेड आगे बढ़ने के लिए बेहतर समावेशी राजनीति करने को तैयार हैं?
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