ईरान में मातम और नाराजगी का माहौल है। जहां, अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को आखिरी अलविदा कहते हुए ईरानवासी रो रहे हैं, वहीं, नाराजगी उस अमेरिका पर है, जिसकी वजह से ईरान को ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं। तेहरान की गलियों में मातम का इजहार करने वालों का ऐसा सैलाब आया है कि दुनिया दंग है। ऐसे बहुत लोग हैं, जिन्हें अब 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खामेनेई की शोहरत का अंदाजा हो रहा है। खामेनेई ने साल 1989 से इस साल 28 फरवरी तक ईरान का दृढ़ता से नेतृत्व किया। ईरानवासी बार-बार याद कर रहे हैं कि कैसे अमेरिकी-इजरायली हमलों के पहले दिन ही उनके नेता शहीद कर दिए गए। बहुत सब्र के साथ ईरानी प्रशासन ने खामेनेई को आखिरी विदाई देने का इंतजार किया है। अब जब युद्ध विराम चल रहा है, तब ईरान अपने सर्वोच्च नेता को अपनी तहजीब के हिसाब से, पूरी इज्जत से अलविदा कह रहा है। भारत सहित दुनिया भर के हजारों नेता और प्रतिनिधि ईरान के साथ इस गमी में शामिल हुए हैं।
बेशक, ईरान और उसकी नीतियों से किसी की असहमति हो सकती है। आज सभी मुस्लिम देश भी ईरान के साथ नहीं हैं, लेकिन किसी बड़े नेता को श्रद्धांजलि पूरी तरह से शांति का समय है। ऐसे समय में, दुनिया के हर नेता को संयम और समझ का परिचय देना चाहिए, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो बयान दिए हैं, उसकी कतई तारीफ नहीं हो सकती। वह एक तरह से शोक का उपहास उड़ा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि उन्हें ईरानी नेता की इतनी लोकप्रियता का अंदाजा नहीं था। यहां अव्वल तो यह कहना चाहिए कि खामेनेई की ताजा प्रचंड लोकप्रियता में ट्रंप का भी बड़ा योगदान है। दिसंबर से फरवरी तक जो ईरानी अमेरिका के साथ थे, जो सड़कों पर जोखिम उठाकर बगावत का झंडा बुलंद कर रहे थे, वह भी अमेरिकी हमले के बाद अपने नेता के समर्थन में आ गए। ईरान में जिस तरह से आम लोगों या स्कूल को निशाना बनाया गया, उससे वहां अमेरिका की अलोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। अब वहां अमेरिका के प्रति जो नफरत दिख रही है, वह बेहद अशुभ संकेत है। यह कोई पहली बार नहीं है, जब कुछ पीड़ित लोगों ने अपने देश में अच्छे बदलाव के लिए अमेरिका का आह्वान किया था, पर अमेरिका द्वारा की गई बेरहम दखलंदाजी ने सबकुछ बिगाड़ दिया। काश! खामेनेई की लोकप्रियता का अंदाजा पहले ही डोनाल्ड ट्रंप को हो जाता, तो युद्ध की नौबत नहीं आती। अब जो तबाही हो गई, क्या उसे ईरान भूल पाएगा?
यह दुनिया के लिए दुखद दौर है, जब ईरान में शोक मनाने के लिए नेता जुटे हैं। मौके की नजाकत को न समझते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो कहा है, उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा है कि यह मौका है, जब ईरान का वरिष्ठ नेतृत्व एक जगह जुटा है और उसे एक झटके में खत्म किया जा सकता है। वैसे, अगले ही वाक्य में ट्रंप ने यह भी कहा है कि वह ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि समझौते के लिए वार्ता चल रही है। फिर भी, उनकी अगंभीरता ने विश्व राजनय पर अपने गहरे पंजे छोड़ दिए हैं। दुश्मनों को भी ऐसे इजहार से नहीं नवाजा जाता है। इसके जवाब में ईरान का बयान ज्यादा मुफीद है कि अमेरिका के पास न तो सभ्यता है और न इतिहास। ऐसे अमेरिकी नेता पर कौन यकीन करेगा? आश्चर्य नहीं कि ईरान अपने नए सुप्रीम नेता को सामने नहीं ला रहा है। अविश्वास का संकट गहरा है। आज विश्व में जहां शोक का उपहास रोकने की जरूरत है, वहीं रोष को भी आपा नहीं खोना चाहिए।
-संपादकीय के लिए लिखी गई टिप्पणी-








