कुमार शहानी और मणि कौल का महत्व

सिनेमा के विशाल घर में भी पूजा या इबादत का एक कोना है, जहां बेहतर इंसान होना बुनियादी शर्त है। अगर आप जगे हुए इंसान नहीं हैं, तो इस पवित्र कोने पर आपकी नजर ही नहीं पड़ेगी। बेशक, बहुत सा सिनेमा सिर्फ दिखावा या शो-बाजी है। कुछ ही सिनेमा प्रेम या हृदय तक पहुंचता है और हजार में कोई एक-दो सिनेमा ही उन ऊंचाइयों का स्पर्श करता है, जिसे हम भक्ति कह सकते हैं। यहां हम कह सकते हैं कि कुमार शहानी और मणि कौल विरल भक्त फिल्मकार थे।

मणि कौल जालौर, जोधपुर में पले बढ़े थे, तो कुमार का बचपन लरकाना, सिंध में बीता था। बंटवारा उन्हें सात की उम्र में ही बाम्बे ले आया था। बहुत संघर्ष के बीच उन्होंने खुद को खड़ा किया और वह भारतीय सिनेमा के गिने-चुने कवि हृदय फिल्मकारों में शुमार थे।
उस दौर के अब एक ही संत फिल्मकार बचे हैं, अडूर गोपालकृष्णन, जो पुणे फिल्म संस्थान में कुमार शहानी से एक साल सीनियर थे। संयोग ही है कि 32 की उम्र में कुमार शहानी ने अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ कृति फिल्म ‘माया दर्पण’ लेकर आए। वह साल 1972 था और केरल में अडूर की फिल्म ‘स्वयंवरम’ का डंका बज रहा था। दोनों ही फिल्मों पर सम्मान की बारिश हुई थी। दोनों ही फिल्में कालजयी श्रेणी में गिने जाती हैं। वैसे जब हम कुमार शहानी की चर्चा करते हैं, तो अनायास मणि कौल की भी याद उमड़ आती है।

मेरा यह सौभाग्य रहा है कि मैंने मणि कौल को देखा है, पर कुमार शहानी को तो लगभग चरणों में बैठकर देखा और सुना है। तुलसीनगर, भोपाल स्थित वह गुरुतुल्य उदयन वाजपेयी जी का कोने का मकान और उसमें कोने का वह किताबों से लबालब सजा कमरा। बाहर खुलती खिड़की के ठीक अंदर कुमार शहानी बैठे थे। उदयन जी की यह खासियत रही है कि वह अपने गुरुतुल्य वरिष्ठों के लिए अपनी कुर्सी छोड़ देते हैं। मुझे मणि कौल और कुमार शहानी के सृजन का पहला रसास्वादन कराने वाले उदयन जी हैं, उनकी मणि कौल से संवाद की अद्भुत पुस्तक है – अभेद आकाश और कुमार शहानी से संवाद की उतनी ही अनुपम पुस्तक है – सिनेमा और संसार।
भक्ति स्तरीय सिनेमा को हिंदी में समझने के लिए इनसे बेहतर पुस्तकें नहीं हो सकतीं।

मणि कौल की फिल्म इडियट के एक दृश्य में शाहरूख खान

बहरहाल, पुणे में फिल्म संस्थान में मणि और कुमार साथ पढ़ते थे और परम मित्र थे। अभेद आकाश में मणि कौल ने याद किया है, ‘कुमार और मैं बहुत गहरे दोस्त थे। मतलब चौबीसों घंटे साथ रहते थे। हमें अलग करना बहुत मुश्किल था।’ किंतु समय को देखिए, साल 2011 में ही मणि कौल दुनिया से विदा हो गए और अब साल 2024 कुमार शहानी को भी ले गया। वैसे मणि उम्र में कुमार से चार साल छोटे थे, पर तुलनात्मक रूप से मणि बहुत तीव्र मेधा के स्वामी थे। जो सम्मान कुमार को ‘माया दर्पण’ के लिए 1972 में मिला, वैसा ही सम्मान मणि को साल 1969 में ‘उसकी रोटी’ के लिए मिल चुका था। दोनों मित्रों के उच्चस्तरीय सिनेमा का साहित्य की दुनिया से गहरा नाता देखिए, ‘माया दर्पण’ निर्मल वर्मा की रचना है और ‘उसकी रोटी’ मोहन राकेश की। मतलब यह कि सच्चे श्रेष्ठ फिल्मकार अपने समय के श्रेष्ठ साहित्य को साथ लेकर अपना श्रेष्ठ रच रहे थे।

विडंबना देखिए, मणि और कुमार जब अपना श्रेष्ठ दे रहे थे, तब भारतीय मुख्यधारा सिनेमा में सुपर स्टार राजेश खन्ना का डंका बज रहा था।
कोई शक नहीं कि मणि और कुमार के सिनेमा पर सच्चा अध्ययन अभी शेष है। सिनेमा और संसार पुस्तक की प्रस्तावना में उदयन वाजपेयी लिखते हैं, ‘ऋत्विक घटक और सत्यजित राय के बाद कुमार शहानी और मणि कौल संभवत: देश के सबसे अधिक महत्वपूर्ण फिल्मकार रहे हैं। इनकी फिल्मों ने न सिर्फ हमारे फिल्म के देखने में बुनियादी बदलाव लाया है, बल्कि इन फिल्मों की रोशनी में हम वास्तविकता और स्वयं अपने आप को भी कुछ और तरह से ही अनुभव करने के रास्ते खोज सके हैं या खोज सकते हैं।’

कुमार में गजब की भारतीयता थी। बाद के दिनों में उन्होंने संस्कृत का भी अध्ययन किया, ताकि सीधे भारतीय शास्त्र परंपरा से जुड़ सकें। वह बहुत सहजता से बोल पाते थे कि फिल्म बनाना आध्यात्मिक कर्म है।
वाकई, संसार में अद्भुत लोग असंभव नहीं, विरल हैं। कुमार ने महान फ्रांसीसी फिल्मकार रोबेर ब्रेसां को याद करते हुए कहा है, ब्रेसां टेलीफोन पर इच्छुक अभिनेता की आवाज से यह अनुमान लगाने की कोशिश करते थे कि इस व्यक्ति में कोई आध्यात्मिक रुझान है या नहीं। अभिनेता उनके लिए गैर-अभिनेता होते थे। मतलब, अभिनेता होने के लिए आध्यात्मिक पवित्रता से लैस होना आवश्यक था।
ठीक ऐसे ही, कुमार और मणि को याद करते हुए फ्रांसीसी फिल्मकार गोदार को क्यों न याद किया जाए? मणि कौल ने ‘अभेद आकाश’ में बताया है कि गोदार जिंदगी भर उस हॉलीवुड की इमेज से लड़ते रहे, यही सिद्ध करने के लिए कि उसमें कोई दम नहीं है।’

खबरदार, लड़ने शब्द से यह न समझ लीजिएगा कि ये ऐसे फिल्मकार थे, जिनकी फिल्में सराही नहीं जाती थीं या ज्यादा पैसे नहीं कमा पाती थीं या ये फिल्मकार अपने सृजन की वजह से कुंठित रहते थे। मूल तत्व यह था कि मणि, कुमार, ब्रेसां या गोदार, ये सभी बहुत खुशनुमा विभूतियां थीं, जो अपने मन-जीवन को निरंतर तराशती रहीं। ब्रेसां को 98 वर्ष का शानदार जीवन मिला, तो गोदार दो साल पहले साल 2022 में ही 91 वर्ष जी कर दुनिया से विदा हुए हैं।
इन्हें जब भी याद किया जाएगा, सम्मान स्वत: उमड़ पड़ेगा। सिनेमा के लिए मणि को दो राष्ट्रीय पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले, जबकि कुमार को तीन राष्ट्रीय और तीन फिल्मफेयर। बनाओ, तो अच्छी बनाओ, वरना कुछ और अच्छा करो, बहुत कुछ है अच्छा करने के लिए। जीवन केवल फिल्म बनाने के लिए नहीं होता, जीवन बहुत कुछ करने के लिए होता है। मणि और कुमार, दोनों ने ही अपने जीवन में संगीत से फिल्म शिक्षा तक और लेखन से प्रवचन तक बहुत कुछ किया। कुमार कहते थे या सावधान करते थे कि ‘हमारे शरीर की हर कोशिका जानना चाहती है और जाहिर है, सारी चीख-चिल्लाहट हमें ज्ञान प्राप्त करने से रोकने के लिए की जा रही है।’
शायद हम किसी दिन झूठे सिनेमा की क्षणभंगुरता और सच्चे सिनेमा की सनातनता को जरूर समझेंगे। शायद किसी दिन सिनेमा के विशाल घर में मौजूद पूजा के कोने पर सभी की नजर पड़ेगी।
(अभेद आकाश – वाणी प्रकाशन, सिनेमा और संसार – राजकमल प्रकाशन)

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