कॉमरेड चंद्रशेखर प्रसाद को भूलते वाम दल

भारत में जब अच्छे छात्र नेताओं के नाम की चर्चा होती है, तब एक नाम कॉमरेड चंद्रशेखर प्रसाद का जरूर आता है। कॉमरेड को शहीद हुए अब तीन दशक बीतने वाले हैं। साल 1997 में उनकी हत्या बिहार के शहर सिवान में सबसे मुख्य सड़क पर दिनदहाड़े हुई थी। जेन जी पीढ़ी उन्हें नहीं जानती है, पर यह बताना जरूरी है कि चंद्रशेखर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के सदस्य थे। दो बार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में छात्र संघ अध्यक्ष रहे थे और उसके पहले उपाध्यक्ष भी रहे थे। वह दिल्ली के गलियारों में नहीं खोए, सीधे अपने शहर-गांव के विकास के लिए, माहौल को सुधारने के लिए, जमीनी राजनीति में उतर आए और सिवान में उनका पाला सीधे मोहम्मद शहाबुद्दीन से पड़ गया। शहाबुद्दीन को आज भी सिवान में लोग साहेब कहते हैं। साहेब तब लोकसभा सांसद थे, सिवान में उनकी तूती बोलती थी। तब वह जो बोलते थे, वही कानून में बदल जाता था। पुलिस की फाइल में उनका नाम ए ग्रेड क्रिमिनल में शुमार था, लेकिन वह लालू प्रसाद यादव की पार्टी की ओर से देश की सर्वोच्च पंचायत में पहुंच गए थे।

तब सिवान में भाजपा कहीं परिदृश्य में नहीं थी। कॉमरेड चंद्रशेखर की राह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं आया। उनके सामने सांसद महोदय के गुंडे आए। कहा ही जाता है कि दलितों के ख्यात मसीहा लालू प्रसाद यादव की पार्टी उन्हें पालती थी और तब वाम दलों ने ही एक शब्द इस्तेमाल किया था, गुंडाराज। बाद में जंगलराज संबोधन भी इस्तेमाल हुआ।

बहरहाल, कॉमरेड चंद्रशेखर या वामदल से यह गलती तो हुई कि मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे खतरे को कम आंका गया। शायद चंद्रशेखर को अपनी ख्याति पर ज्यादा भरोसा था, पर उन्हें शहाबुद्दीन ने सामने खड़े होने का मौका नहीं दिया। चंद्रशेखर की हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन हुए थे। कॉमरेड को न्याय दिलाने की मांग हुई, पर वाम दलों ने क्या किया? लगभग हमेशा लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े रहे। सिवान में कॉमरेड समाज शहाबुद्दीन से लड़ता रहा और पटना में गठबंधन का सिलसिला चलता रहा।  आज भी वाम दल लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ हैं। यह बात वाम दल जानते थे कि लालटेन की राजनीति जितनी जातिवादी थी, उतनी ही सांप्रदायिक भी थी।

आज पता नहीं, कॉमरेडों को गुंडाराज याद भी है या नहीं। शायद याद नहीं है, तभी तो भारत में वामदल कमजोर होते गए हैं।बिहार में आज भी अनेक कॉमरेड जमीन पर अच्छा काम करते हैं, पर उन्हें जैसा समर्थन पटना या दिल्ली से मिलना चाहिए, वैसा नहीं मिलता है।

छात्र संगठन आइसा को खड़ा करने में चंद्रशेखर का बड़ा योगदान था। चंद्रशेखर अलग मिजाज के ठेठ बिहारी कॉमरेड थे। उनके साथ टुकड़े-टुकड़े वाला मामला नहीं था। वह कन्हैया कुमार जैसे नहीं थे। वह नेहा बोरा की तरह नहीं थे। वह अपने क्षेत्र में अपने लोगों के बीच काम करने वाले नेता थे। अगर उनके मन में चालाकी या धूर्तता होती, तो वह अपने बेहद पिछड़े शहर में नहीं लौटते, दिल्ली में सत्ता भोग रहे होते। जब दुनिया से विदा हुए, तब बिहार की बिदेशिया लोक शैली पर जेएनयू से ही पीएचडी कर रहे थे। संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। आज भी तमाम कॉमरेड मानते हैं कि चंद्रशेखर का काम अधूरा है, लेकिन क्या यह काम उन्हीं लोगों के साथ मिलकर पूरा होगा, जो चंद्रशेखर की हत्या के लिए परोक्ष या प्रत्यक्ष जिम्मेदार थे?

यह ध्यान देने की बात है, बिहार में शहाबुद्दीन के गुंडाराज का अंत भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद ही संभव हुआ है। सिवान के हरे में भगवा कुछ ऑक्सीजन की तरह घुला। वरना बीच में जब लालटेन में सत्ता की रोशनी लौटी थी, तब शहाबुद्दीन को जेल से छोड़ दिया गया था। हालांकि, वाम दल तो भाजपा या आरएसएस के जानी दुश्मन जैसे हैं।

अपनी कामयाबी के लिए वाम दलों को अपना काडर फिर बनाना पड़ेगा और उस काडर की सुनवाई ऊपर तक करनी पड़ेगी। ध्यान रहे, भाजपा काडर आधारित पार्टी है और उसकी ताकत का अभी किसी एक पार्टी के पास माकूल जवाब नहीं है। गठबंधन वामपंथियों ही नहीं, तमाम विपक्षियों की मजबूरी है और आगे भी रहेगा, तो क्या कॉमरेड चंद्रशेखर का काम कभी पूरा होगा?

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