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संपादन की समस्या और समाधान-3

प्रूफ की समस्या पत्रकारिता में प्रूफ की समस्या शास्वत है। प्रूफ की गलती तब भी होती थी, जब प्रूफ के अलग विभाग हुआ करता था और अब भी होती है। अब प्रूफ का काम भी सम्पादकों के जिम्मे आ गया है। सम्पादकों में बहुत कम ऐसे होते हैं, जो प्रूफ को अपना काम मानते हैं। …

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कोयल नदी

(प्यारे साथी अमलेंदु के लिए) हमने जीया है गले तक बहता बारिश भर प्यार। हरियाये पहाड़ों के रोमछिद्रों से उमड़ते, उतरते बहते बादल कभी गले से नथुने तक। मां की तरह रंगबिरंगी छोटी-छोटी नावों के ख्वाब दिखाकर धीरे से उस नदी ने हमें पिला दिया है सच्चे प्यार का मटमैलापन। और निगोड़ी जीभ आज भी …

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संपादन की समस्या और समाधान-2

योजना में कमी सम्पादन में योजना की बड़ी अहमियत होती है। कार्य या पृष्ठ की योजना या जरूरत को ध्यान में रखे बिना समाचार या विचार के सम्पादन की जल्दी कई बार खराब रूप में सामने आती है। आजकल पैकेज तैयार करने का बड़ा चलन है। एक तरह की खबरों को एक जगह लगाने की …

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काश! एक दिन सुधरेगा चीन

एक रिपोर्टिंग – एक कहानी   नकली हर जगह हावी है। असली के ठीक बगल में नकली, मतलब सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। एक कदम धीमे चलकर ल्हासा कहां लिखा है, खोजता हूं और पा जाता हूं। उधर बढ़ता हूं, जहां एक घेरा है, तिब्बतियों का, जो हर साल गर्म कपड़ों का बाजार सजाते हैं। …

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संपादन की समस्या और समाधान

पत्रकारिता की क्लास – सम्पादन का विज्ञान दिमाग पैराशूट की तरह होता है, तभी काम करता है, जब खुला होता है। अगर रिपोर्टर पत्रकारिता रूपी रथ के अश्व हैं, तो सम्पादन से जुड़े पत्रकार लगाम और सारथी। रिपोर्टर आंख, कान और नाक हैं, जबकि सम्पादन से जुड़े पत्रकार दिल और दिमाग । सम्पादन में प्रवाह …

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असली और अच्छे सिनेमा को बचाना होगा : अडूर गोपालकृष्णन

साक्षात्कार / अडूर गोपालकृष्णन / फिल्मकार भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फाल्के से सम्मानित अडूर गोपालकृष्णन दुनिया के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में शुमार हैं। इनकी पहली फीचर फिल्म स्वयंवरम  50 वर्ष पहले प्रदर्शित हुई थी। तब से महज 12 फिल्में, लेकिन 16 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उन्हें अलग श्रेणी में खड़ा कर देते हैं। …

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लड़कर किसको क्या मिलता है : मिखाइल गोर्बाच्योफ

(आज जो लोग व्लादिमीर पुतिन का रूस देख रहे हैं, उन्हें जरूर जानना चाहिए कि गोर्वाच्योफ के समय रूस या सोवियत संघ कैसा था ? जमीन आसमान का अंतर आ गया है। यहां उनके जीवन की एक कथा पेश है।) नाना कैद से छूटकर आए थे और उनके दर्द की दारुण दास्तां सुनकर ऐसा लगता …

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कला दुनिया ने उन्हें प्यार से कहा, बाबा

वह संगीत में और संगीत उसमें बसता था। पिता सितार बजाते थे, तो उसके दिलो-दिमाग के तार बज उठते थे- सा रे ग म प ध नि सां…।  इस आरोह में एक लहर सी उठती थी और फिर अवरोह पर आती थी- सां नि ध प म ग रे सा। बार-बार गूंजता रहता था और …

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आपदा देखते जन्मा महान फिल्मकार

अकीरा कुरोसावा ,मशहूर जापानी फिल्मकार आपदाएं सिर्फ बाहरी दुनिया में ही नहीं, मन में कहीं गहरे भी घटित होती हैं। हाहाकार सिर्फ ऊपर-बाहर से ही नहीं गुजर जाता, कहीं अंदर भी रगों में बहने लगता है। जो आपदाएं रगों में बहती हैं, वो ताउम्र पीछा नहीं छोड़तीं। वह आपदा भी ऐसी ही थी, जिसे देखने …

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न्याय की गुहार लिए बस एक टेलीग्राम

अडूर गोपालकृष्णन, मशहूर फिल्मकार बादल जब अपने भारत आगमन का बिगुल बजा देते हैं, तब सबको पता है, वे आएंगे और सबसे पहले केरल को नहलाएंगे। ठीक पचास साल पहले भी यही सब हो रहा था, लेकिन उसी समय केरल में एक ऐसे युवा फिल्म निर्देशक थे, जो बहुत निराश थे। लगभग सात साल इंतजार …

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