पुरी में जगन्नाथ मंदिर से बस एक जिला दूर गांव सोबाला है, जहां एक अबोध बालक स्थानीय नाटक या यात्रा मंडली में काम करता था। अक्सर बालिका का अभिनय करता। कभी कोई वाद्य बजाता, तो कभी कुछ गाने का मौका भी मिल जाता। एक दिन वह बहुत भाव से ओडिया गीत गा रहा था, भाव कुछ इस प्रकार थे- हे मन भ्रमर तुम्हारा इस पुष्प में ज्यादा नहीं ठिकाना।
वहां पास ही मौजूद स्थानीय संगीत शिक्षक बेनुधर परिडा बालक की आवाज सुन भाव-विभोर हुए जा रहे थे। वह सुनते ही समझ गए थे कि यह आवाज गांवों या यात्रा में खो जाने के लिए नहीं है। उन्होंने आगे बढ़कर उस बालक-गायक से संपर्क साधा और कहा, तुम पर भगवान जगन्नाथ की कृपा दिख रही है। तुम में प्रतिभा है। तुम संगीत की अच्छी सेवा कर सकते हो।
बालक ने भी अपनी व्यथा-कथा सुनाई कि मैं अनाथ हूं। कुछ समय पहले मां का स्वर्गवास हुआ है और पिता तो दो साल पहले साथ छोड़ गए। सौतेले बड़े भाई-भाभी का आसरा है। मैं ठहरा अभागा। तीसरी कक्षा तक पढ़ाई हुई है और यात्रा में यदा-कदा काम मिल जाता है, तो किसी तरह काम चल रहा है।
बेनुधर जी ने पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? जवाब मिला, मेरा नाम भिखारी बल है। मुझसे पहले मेरे अनेक भाई-बहन हुए, पर कोई न बचा। अत: मेरा जब जन्म हुआ, तब माता-पिता ने नाम रख दिया भिखारी। बताते हैं कि मुझे एक सच्चे भिखारी को बेचकर फिर खरीदा गया था, ताकि मेरा जीवन बच जाए, पर अब मुझ अभागे के माता-पिता का जीवन ही नहीं रहा।
बेनुधर जी ने ढाढ़स बंधाया, तुम हृदय से मत हारो। मैं बहुत अच्छा गायक नहीं हूं, पर मैं जितना संगीत जानता हूं, उतना तुम्हें अवश्य सिखाऊंगा। तुम यात्रा में अभिनय के लिए नहीं बने हो।
बेनुधर जी ने सिखाना शुरू किया और कुछ वर्ष बाद एक स्थानीय संगीत विद्यालय में भिखारी को संगीत शिक्षक बनवा दिया। वह जब भी मिलते थे, खूब प्रेरित करते थे कि संगीत में बहुत आगे बढ़ो और सीखो। अच्छे गुरुओं के पास जाओ।
बड़े गुरु की खोज में पहले क्षितिज मित्रा मिले और उसके बाद दिग्गज संगीतकार बालकृष्ण दास की संगत में भिखारी के संगीत ने बेहिसाब बल हासिल किया। इसका लाभ यह हुआ कि ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी लग गई। ए ग्रेड आर्टिस्ट हो गए। गरीबी और गुमनामी के दिन पीछे छूट गए और संगीत साधना भी बढ़ चली। जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब भिखारी ने जगन्नाथ जी के एक भजन का स्वर दिया- कोठ भोग खिया, मो चका आंखिया…। भजन में अभागा, अनाथ और निर्धन होने का दर्द उमड़ पड़ा। मीठी आवाज में भगवान की प्रार्थना किसी आर्तनाद की तरह उलाहना देने लगी कि हे खूब भोग लगाने वाले, गोल आंखों वाले मेरे भगवान, नींद से जागो, उठो, हे छप्पन भोग खाकर सोने वाले, देखो, पंडा, सेवक सब द्वार पर खड़े हैं, हाथों में चंदन और तुलसी हार लिए। जगत के नाथ होते हुए भी अनाथों की गुहार नहीं सुन रहे हो? उठो, हे गोल आंखों वाले भगवान।
इस भजन ने भगवान का ऐसा मानवीकरण किया कि लोग रो पड़े। जो भी इस गीत को सुनता, उसे लगता कि यह तो उसकी अपनी पुकार है। भिखारी बल ने भक्ति को व्यक्तिगत साधना से सामूहिक साधना में बदल दिया। एक अलग ही भक्ति-भजन भूमि पर ओडिशा सांस लेने लगा। भिखारी अपनी ख्याति से सदा के लिए अमीर हो गए। जगन्नाथ भजन औरगीत गोविंद केे गायन ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्ध कर दिया। पुरी की राज परंपरा के गजपति ने भिखारी को भजन सम्राट की उपाधि से विभूषित किया। बाहरी लोगों को मंदिर में सेवा का अवसर कभी नहीं मिलता, पर भिखारी को भगवान जगन्नाथ के चंवर सेवक होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। देश, विदेश में उन्हें जो भी धन मिलता, उसका एक बड़ा हिस्सा जगन्नाथ मंदिर में भेंट कर देते थे। जगन्नाथ सेवा में वह रोने लगते थे। उनका यह क्रंदन उनकी बोली में मिठास बनकर घुल जाता था। सुनने वाले कह उठते कि भिखारी से मीठा भजन कोई नहीं गा सकता। ओडिशा के स्कूलों में उन्हीं की गायन शैली में भगवान जगन्नाथ के मुस्लिम भक्त शालबेग की लिखी प्रार्थना हर सुबह गाई जाती ह- आहे नील शैल।
ख्याति के शिखर पर भी भिखारी (1929-2010) अपने प्रथम गुरु को नहीं भूले। उन्होंने अपने गांव में गुरु बेनुधर परिडा के नाम से आश्रम बनाया। 25 मई को जन्मे भिखारी की संसार सेवा जब संपन्न हुई, तब पूरा ओडिशा रो पड़ा। दुर्लभ अवसर था, जगन्नाथ मंदिर से ही उनके संस्कार के लिए वस्त्र और वैष्णव अग्नि आई। उनसे ओडिया का भजन संसार समृद्ध है और उनकी प्रार्थना आज भी गूंज रही है। भगवान के चरण में शरण मांग रही है- दे रे कालिया दे, तो पादे शरण दे…।








