अब्दुल हमीद कैसे बने परमवीर विजेता

देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून

अब्दुल हमीद

परमवीर चक्र विजेता

Abdul Hamid

एक वेद वाक्य है- मा हस्यिंात सर्वा भूतानि अर्थात किसी भी जीव के साथ हिंसा न कीजिए। भारतीय संस्कृति में यहां तक संदेश दिया गया है कि मन में भी किसी के प्रति हिंसा का भाव न लाएं। तभी तो मानव इतिहास में भारत संभवत: इकलौती ऐसी सभ्यता है, जिसने कभी किसी देश पर चढ़-बैठने की असभ्यता नहीं की, पर दुर्भाग्य कि सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जमां हमारा। नतीजा यह कि रक्षा के लिए हमें पलटन रखनी पड़ती है।

उसी पलटन के एक जवान अपने गांव धामूपुर, गाजीपुर पहुंचे थे। वह सीना ताने बचपन के दोस्त से मिलने पहुंचे थे। दोस्त साहब अपनी छोटी सी दुकान पर सिलाई मशीन के साथ काम में जुटे थे। दर्जी दोस्त को फौजी दोस्त ने आवाज दी। दर्जी दोस्त की खुशी का ठिकाना न था, फौजी दोस्त को गले लगा लिया और फौजी दोस्त ने पलटन की तारीफ शुरू की। फौज में बहुत सम्मान है, जब से देश आजाद हुआ है, तब से लोगों का फौजियों के प्रति प्रेम बहुत बढ़ गया है। सरकार भी फौजियों को बहुत तरजीह देती है। खुद प्रधानमंत्री जवानों का उत्साह बढ़ाते हैं। फौज की तारीफ सुनकर दर्जी दोस्त की आंखें कल्पना लोक में खो जा रही थीं। मन बोल पड़ा, असली काम तो पलटनिया में है, दर्जी का काम जरूरी है, पर उतना बड़ा नहीं है। पलटन में होने और देश सेवा करने का काम ज्यादा बड़ा है। इतना सम्मान है, खूब भोजन मिलता है, वर्दी मिलती है, सुविधाएं मिलती हैं और सबसे बढ़कर देश-सेवा का मौका मिलता है। बीत गया अंग्रेजों का जमाना, जब फौजियों को हिकारत भरी नजरों से देखा जाता था, अब तो सरकार पलटन को सिर-आंखों पर सजाती है।  फौजी दोस्त ने भी प्रेरित किया कि तुम सिलाई मशीन छोड़ो और मशीन गन थामो, फिर देखो कि तुम्हारी जिंदगी कैसे बदलती है!

इस एक मुलाकात ने दर्जी दोस्त की जिंदगी का मकसद बदल दिया। दिल पलटन से जा लगा। उन्होंने अपने पिता को बताया कि मैं पलटन में जाना चाहता हूं, तो पिता बेचैन हो गए। पिता ने सोचा कि बहुत मुश्किल से बेटे ने दर्जी का काम संभाला है, दुकान ठीक चल पड़ी है, पर अब यह काम छोड़ पलटन में जाना चाहता है। माता-पिता का भी अपना दिल होता है, वे नहीं चाहते थे कि उनका बेटा उनसे दूर हो जाए। माता-पिता ने बेटे को गांव में ही रोकने का इंतजाम किया। बेटे की शादी करा दी कि मन बदल जाएगा, पर पलटन में जाने की धुन यूं सवार थी कि उतरती न थी। फिर एक दिन आया, जब पत्नी ने पति की मर्जी मंजूर करते हुए कह दिया, आपका जो दिल करे, कीजिए। फिर क्या था, दर्जी साहब पलटन में भर्ती होने के लिए घर से निकल पड़े। लंबा, छरहरा, फुर्तीला बदन था, जोश, जुनून था, तो पलटन में आसानी से बहाली हो गई। वह अपने गांव के फौजी दोस्त की बटालियन में ही पहुंच गए। 21 की उम्र में बहाल हुए और 28 की उम्र में चीन की सीमा पर तैनात किए गए। चीन ने हमला बोल रखा था, भारत की फौज उतनी तैयार नहीं थी, जगह-जगह पीछे लौटना पड़ा। फौजी पहाड़ी दर्रों और राहों से अनजान थे, लौटते हुए भी सैकड़ों सैनिक रास्ता भटक गए थे। गाजीपुर का यह जवान भी रास्ता ऐसे भटका कि अकेले ही पूरे आठ दिन पहाड़ों, दर्रों से भूखे-प्यासे गुजरते हुए मरणासन्न स्थिति में भारतीय चौकी तक पहुंचा और यह सूचना दल्लिी तक पहुंची कि एक जवान अब्दुल हमीद (1933-1965) बहुत बुरी स्थिति में मोर्चे से लौटे हैं।

चीन से हुई जंग ने हमीद को भी बहुत निराश कर दिया था। दिली तमन्ना थी कि देश को अपनी वीरता का परिचय देंगे, जंग में कुछ बड़ा करेंगे। यह मौका भी जल्दी ही आ गया। जवान की उम्र अपने 32वें पायदान पर चढ़ी ही थी, पाकस्तिान ने हमला बोल दिया। पंजाब के खेमकरण में दुश्मन फौज चढ़ आई थी। अमेरिकी पैटन टैंकों का आतंक था, क्योंकि दुनिया में तब उनका कोई तोड़ न था। भारतीय फौज भी चिंतित थी कि इन टैंकों के साथ जब दुश्मन आगे बढ़ेगा, तो रोकना मुश्किल हो जाएगा, पर अपने जज्बे और हुनर से हमीद ने इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। एक मामूली जीप पर लगी लंबी बंदूक से पैटन टैंक के भेद्य हस्सिों पर जब वीर हमीद ने निशाना बनाना शुरू किया, तो एक-एक कर टैंक ढेर होने लगे। दुश्मन फौज मुंह चुराकर भागने लगी और भारतीय फौज मुंहतोड़ जवाब देती बढ़ चली।

वीर हमीद की चर्चा दल्लिी से अमेरिका तक हुई। वह इसी लड़ाई में दुश्मन के टैंकों को ध्वस्त करते हुए शहीद हुए और भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से नवाजे गए। कोई बड़ा कारनामा करके देश के काम आने का ख्वाब पूरा हुआ। दर्जी से परमवीर तक का शानदार सफर पूरा करने वाले अब्दुल हमीद को याद करते हुए भारतीय जवान आज भी जुनून से भर जाते हैं कि शान तेरी कभी हो न कम, ऐ वतन, मेरे वतन।

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