महाकुम्भ मेला 2025 अपनी सुखद-दुखद स्मृतियों के साथ समाप्त होने को है। कितनों ने कितना पुण्य कमाया, यह विचार की बात नहीं है, सहज स्वीकार्य आस्था की बात है। तर्क अपनी जगह है और कुम्भ की अनेक बातें अपनी जगह। सुविधा है कि आप प्रश्न उठा सकते हैं। प्रश्नों और उनके उत्तर से श्रद्धा बढ़ती है।
बहरहाल, यह शुद्ध और सुखद तथ्य है कि भारतीय समाज आदिकाल से प्रश्नाकुल रहा है।
लगभग 25 साल परदेशी रहे गांधीजी के मन में भी कुंभ को लेकर अनेक प्रश्न थे। ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने सारे प्रश्न लिख दिए। वह साल 1915 में हरिद्वार कुंभ पहुंचे थे और आलोचना दृष्टि से लिखा था, ‘धर्म भावना की अपेक्षा उनका पागलपन, उनकी चंचलता, उनका पाखण्ड और उनकी अव्यवस्था ही अधिक दिखी। साधुओं का तो जमघट ही इकट्ठा हो गया था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे सिर्फ मालपुए और खीर खाने के लिए ही जन्मे हों।’
हालांकि, इसी लेख में उन्होंने स्वीकार किया, ‘…यहां जुटे 17 लाख लोग पाखण्डी नहीं हो सकते।’ …
गांधीजी का अपना तरीका था, तर्क के बाद उन्होंने तय किया कि यहां कोई पाप धुले या न धुले, किन्तु अपनी आत्मशुद्धि के लिए कोई संकल्प अवश्य लेना चाहिए, तो उन्होंने लिखा है, ‘ चौबीस घंटों में पांच चीजों से अधिक कुछ न खाने का और रात्रि-भोजन के त्याग का व्रत मैंने ले लिया।’
आज भी अनेक प्रश्न हैं, जिन पर अवश्य विचार होना चाहिए।
क्या हम कुंभ जाकर कोई संकल्प लेते हैं? क्या हम केवल संगम स्नान कर लौट आते हैं? क्या केवल तन स्नान करता है, मन नहीं? क्या हमने वहां विराज रहे लाखों ज्ञानियों- ध्यानियों और संतों की ज्ञान वर्षा में तनिक भी स्नान किया है? जल स्नान पांच डुबकी और ज्ञान स्नान एक डुबकी भी नहीं? क्या हमने धर्म सत्ता के महा-मेले में पहुंचकर अपनी आत्म सत्ता का नवीनीकरण किया है? क्या हम कुंभ से बिना कुछ लिए बार-बार छूछे लौट आ रहे हैं?
मैंने देखा, वहां हर प्रकार के महात्मा जुटे हैं, आप चुन सकते हैं, आपको सुविधा है। हमारे देश की संस्कृति हमें यह सुविधा देती है, तो फिर केवल आलोचना क्यों? गांधीजी ने आलोचना की, पर उन्होंने आत्म सुधार के लिए कठिन संकल्प भी लिया।
मेले के बाह्य आडंबर से बचते हुए प्रयाग में कहीं मनचाही जगह ही सत्संग कर देखिए, अधिकतर संत मानेंगे कि जल स्नान से ज्यादा महत्व ज्ञान स्नान का है।
खैर, मेला खत्म हो जाएगा, पर गंगा, प्रयाग और संगम कहीं नहीं जाने वाले और न गंगा स्नान का महत्व कम होने वाला है।
कोई संदेह नहीं, भक्ति भीड़ नहीं एकांत खोजती है। जहां एकांत न हो, वहां भक्ति ही नहीं, प्रेम का निवास भी संकट में पड़ जाता है। भारतीय समाज में भीड़ को नहीं, भक्ति को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए और भक्ति का श्रेष्ठ स्वरूप क्या है – शायद दरिद्र नारायण की सेवा।








