एक मनोज वाजपेयी काफी हैं

फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ आम लोगों के खास संघर्ष की बेमिसाल कहानी है। अब तक जो बायोपिक फिल्में बनी हैं, उनमें यह एक बेहतरीन पेशकश है। गाजे-बाजे, तामझाम, बनावटीपन से दूर रहते हुए भी यह फिल्म दर्शकों को बांधे रहती है। जब आप समाज के किसी सच को बिना-लाग लपेट उठाते हैं, तो वह सच मनोरंजक भी हो सकता है और आप उस सच के साथ जुड़ जाते हैं, आपको लगता है कि सच को इस बार आपके लिए जीतना चाहिए। यह बायोपिक बताती है कि सच खूबसूरत और आकर्षक भी हो सकता है। सच का असली रोमांस संघर्ष में है। यह वह संघर्ष है, जो आसाराम बापू, उनके पूरे दल-बल और उनके लगभग 14 छोटे-बड़े महंगे वकीलों के खिलाफ एक खास वकील पूनम चंद सोलंकी ने किया था।

जब संविधान रचा गया था, तब संविधान के रचयिताओं ने कहा था कि संविधान को लोग ही चलाएंगे, अच्छे लोग होंगे, तो संविधान बेहतर काम करेगा और अगर बुरे लोग होंगे, तो अच्छा संविधान भी नाकाम हो जाएगा। एक पेशी पर लाखों की फीस लेने वाले ढेरों वकील आते हैं, संविधान का दुरुपयोग करने के लिए, लेकिन एक वकील पूनम चंद सोलंकी संविधान के सदुपयोग के लिए तत्पर सबके गलत इरादों पर पानी फेर देता है। उसने पोक्सो (कानून) का शब्द-शब्द पढ़ा है, वह होमवर्क करके बैठा है कि ऐसे मामले में बड़े वकीलों को कैसी दलीलों की आदत पड़ी हुई है, नामी वकील मोटा पैसा लेकर कैसे मुजरिमों को जमानत दिलाते हैं। राम जेठमलानी, सुब्रमण्यम स्वामी, सलमान खुर्शीद जैसे ढेरो दिग्गज आसाराम को बचाने आए और मुकाबले के लिए तैयार वकील सोलंकी के सामने ऐसे ढेर हुए कि फिर न लौटे। ऐसी मजबूत सिलसिलेवार सच्ची कहानी की बुनियाद पर रची गई फिल्म कोर्टरूम में साकार होती है। यह फिल्म कोर्टरूम में बहकती नहीं है, मुख्य किरदारों पर जमी रहती है। फिल्म अपने न भटकने में ही खिलती है और सत्य को स्थापित करने के लक्ष्य तक पहुंचती है। ओटीटी का प्लेटफार्म अब बड़ा है, लेकिन थोड़ी और मेहनत से इस फिल्म को बड़े पर्दे पर लाया जा सकता था। जो संघर्ष इस फिल्म में सिद्ध हुआ है, उसे हर भारतीय नागरिक तक पहुंचना चाहिए, ताकि संविधान का दुरुपयोग रुके और सदुपयोग बढ़े।

फिल्म एक मजबूत इरादों के असली वकील पूनम चंद सोलंकी की संघर्ष कथा को बखूबी बयान करती है। सोलंकी के संघर्ष, चरित्र और दृढ़ता को अभिनेता मनोज वाजपेयी ने पर्दे पर बेहतरीन ढंग से पेश किया है। उनका सात्विक अभिनय एक बार फिर निखरकर सामने आया है। मैथड एक्टिंग के दम पर वह वकील के किरदार में तमाम खूबियों के साथ प्रवेश कर गए हैं और पूरी फिल्म को अपनी कला प्रतिभा से चला ले गए हैं। वह हंसते हैं, वह रोते हुए रुलाते हैं, वह क्रोध करते हैं, भयभीत भी हो जाते हैं, स्कूटर से भागते हैं, लेकिन यह सब करते हुए भी वह संघर्ष के लिए बिल्कुल तैयार दिखते हैं। वह हार नहीं मानते, शायद इसलिए कभी हारते हुए दिखते भी नहीं हैं। दर्शक उन्हें हमेशा जीतते हुए देखकर खुश होता रहता है। फिल्म के निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की और लेखक दीपक किंगरानी सच्चे ड्रामा के साथ कोई ड्रामा नहीं करते हैं। यह एक बड़ी बात है। ऐसा नहीं कि खलनायक तो अंतत: मारा ही जाएगा, लेकिन नायक को भी बीच में कुछ पिटते हुए दिखा दो, ताकि परंपरागत रूप से सच जैसा लगेगा। आज संघर्ष ऐसा नहीं है, जब मुकाबला धुरंधरों से हो, तो आम आदमी एक भी सुरक्षा चौकी पर हार नहीं सकता। यह भी देश के आम लोगों के लिए एक सबक है, कभी मत हारो, क्योंकि अगर हार जाओगे, तो जीत शायद फिर कभी हाथ नहीं लगेगी। वकील सोलंकी को पता है कि एक बार कथित बाबा को जमानत मिल गई, तो वह कभी हाथ नहीं आएगा।

मनोज वाजपेयी की जितनी तारीफ की जाए, कम है। वह सात्विक अभिनय में सच को पूरी सच्चाई से साकार कर देते हैं। एक दृश्य में वह बिलखते हुए अपनी मां से कहते हैं, एक बच्ची के सच को अगर मैं दुनिया के सामने नहीं ला पाया, तो किस भगवान की पूजा करूंगा..?

यह इस फिल्म का चरम है, क्योंकि फिल्म में बाबा, भगवान, भक्त की चर्चा है, यह सवाल देर तक दर्शकों के दिमाग में गूंजना चाहिए कि अगर सच को हम नहीं बचा पाए, तो किसी भगवान की पूजा क्या खाक करेंगे?

मनोज वाजपेयी का वाचिक अभिनय एक आग्रह भाव लिए हुए है, जो जोधपुर या मारवाड़ क्षेत्र के लोगों में आमतौर पर होता है। कहीं-कहीं वह मारवाड़ी बोलने की कोशिश करते हैं। हां, फिल्म में मारवाड़ी के लिए कुछ ज्यादा गुंजाइश हो सकती थी।

उनका आंगिक अभिनय खासतौर पर ध्यान देने लायक है। वह झुके-झुके से नजर आते हैं, शायद यही जरूरी है। जब आप एक बच्ची का मुकदमा लड़ रहे हैं, जब आप पर जरूरत से ज्यादा विनम्र रहने की जिम्मेदारी है, जब आपको कहीं भी आक्रामकता का प्रदर्शन नहीं करना है, जब आपको सच का बोझ सहर्ष उठाना है, तो आपको थोड़ा झुकना पड़ेगा। तन कर चलने वाले अक्सर टूट जाते हैं। चूंकि वकील सोलंकी को कभी टूटना नहीं है, इसलिए वह थोड़ा झुककर रहता है। एक और बात, चूंकि इस फिल्म में कोई नायिका नहीं है, जिसकी शायद जरूरत भी नहीं थी, तो वैसे भी नायक का तनकर चलना गैर-जरूरी हो जाता है।

फिल्म में जोधपुर शहर पूरी तरह से निखरकर आया है। मनोज वाजपेयी वहां ढल गए हैं, लेकिन शायद बायोपिक के लिए उन्हें चंद महीने जोधपुर रहते हुए वहां की बोली-भाषा-व्यवहार में उतर जाना था। फिर भी उन्हें वकील के अभिनय के लिए याद किया जाएगा। एक और बात, आमतौर पर इन दिनों मनोज वाजपेयी को अपनी हर दूसरी फिल्म में गंदी गालियां देते देखा जाता है, लेकिन यह अच्छी बात है कि जोधपुर में लोग गालियां बहुत कम देते हैं और इस फिल्म में भी गालियों की जरूरत नहीं पड़ी है। इस अर्थ में भी यह मनोज वाजपेयी की बहुत साफ-सुथरी यादगार फिल्म है, जो परिवार के साथ बेधड़क देखी जा सकती है। आज के दौर में मनोज वाजपेयी एक ऐसे कुशल अभिनेता हैं, जिन्हें स्क्रीन पर रोते हुए, सजल होते हुए, कांपते हुए, झिझकते, सिसकते, भावुक होते हुए दिखना आता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह फिल्म भविष्य में कोर्टरूम दृश्यों को प्रभावित करेगी। रोशनी और अंधेरे का समन्वय निखर उठा है। ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ जैसी और फिल्में जरूर बननी चाहिए, जहां सच हमारा सुखद स्पर्श करे और उस पर हमारा विश्वास बढ़े।

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