लड़कर किसको क्या मिलता है : मिखाइल गोर्बाच्योफ

(आज जो लोग व्लादिमीर पुतिन का रूस देख रहे हैं, उन्हें जरूर जानना चाहिए कि गोर्वाच्योफ के समय रूस या सोवियत संघ कैसा था ? जमीन आसमान का अंतर आ गया है। यहां उनके जीवन की एक कथा पेश है।)

नाना कैद से छूटकर आए थे और उनके दर्द की दारुण दास्तां सुनकर ऐसा लगता था, मानो मौत के मुंह से बाल-बाल बच आए हैं। वह अपना दर्द सुनाते थे, तब जेल सा सन्नाटा आस-पास चढ़ आता था, खूब डराता था और अचंभे में फैलती-भींचती आंखें बरबस छलक आती थीं। पेशे से\"\" किसान नाना ने तो कोई अपराध भी नहीं किया था, कर ही नहीं सकते थे। महज इसलिए उन्हें पकड़कर कैद में डाल दिया गया था, क्योंकि उन पर क्रांतिकारियों से मिले होने का शक था। इंसान की कोई गलती हो, तो भी वह अफसोस कर ले, चुप लगा जाए, लेकिन नाना की गलती नहीं थी। वह दबी जुबान में सुनाते थे, तो उनकी आवाज में एक टूटे हुए दिल की रुलाई महसूस होती थी, जिसे सुनकर सभी घर वाले सिहर जाते थे। उस बच्चे का कोमल हृदय पूरी तरह भय के हवाले हो जाता था। समय ऐसा था कि दादा भी कैद कर लिए गए थे, उनकी व्यथा-कथा अलग थी।

उन दिनों अकाल रह-रह हमला बोलता था। लेनिन सेर थे, तो स्टालिन सवा सेर आए। शासन का शिकंजा ऐसे कस गया कि इंसानों को सांस भी लेनी हो, तो उतनी ही लें, जितनी स्टालिन चाहें। स्टालिन के विचार से इतर जो भी है, उसकी जगह जूतों के नीचे या कैदखानों में है। कई दिनों तक नाना अपनी राम कहानी सुनाते रहे, सुनाना खत्म हुआ, लेकिन बच्चे के मन में वे कहानियां चलचित्र सी चलती रहती थीं। कैसे घसीटते ले गए, कैसे पटका, प्रताड़ित किया, कैसे मुकदमा चला। कहने को वह शिविर था, लेकिन था तो कैदखाना ही। उस बच्चे के मन में शासन-प्रशासन के प्रति दुख और रोष का भाव छप सा गया। वे दिन ऐसे थे, जब देश के बाहर-अंदर लड़ाइयां चलती रहती थीं। एक बार जर्मन फौज ने गांव पर कब्जा कर लिया, पूरे चार महीने जिंदगी तबाह रही। एक समय आया, जब उस बच्चे के पिता को जबरन सेना में शामिल कर दिया गया। कुछ दिनों बाद युद्ध मैदान से शहादत का पैगाम भी आ गया। पूरे तीन दिन परिवार में कोहराम रहा। देश आपस में क्यों लड़ते हैं? लड़कर किसको क्या मिलता है? ऐसा लगता था, जिंदगी बेकार है, सब कुछ खत्म। फिर कुछ महीनों बाद पिता अचानक अवतरित हुए, एक अन्य युद्ध से घायल। कंबाइन हार्वेस्टर मशीन बनाने-चलाने का काम पिता ने फिर शुरू किया। लाल सोवियत संघ में सामूहिक खेती होती थी, उसी में सभी किसान लगे रहते थे। बच्चा अब किशोर हो चुका था, उसने ठान लिया था कि खूब मेहनत-लगन से सम्मान के उस स्तर तक पहुंचना है, जहां शासन जब भी सामने आए, सीधी नजरों से देखे। कोई पकड़कर वैसे न ले जाने पाए, जैसे नाना को ले गए थे, जैसे पिता को फरमान सुना दिया था। कम से कम इतना अनाज और इंतजाम हो कि किसी रिश्तेदार, पास-पड़ोसी की भूख से मौत न हो।

महज 16 की उम्र थी, सामूहिक खेत में वह किशोर मिखाइल गोर्बाच्योफ (जन्म 1931) ऐसे लगे थे कि उत्पादन का रिकॉर्ड तोड़कर ही दम लेना है। ऐसे तोड़ देना है कि गरीबी फिर परिवार के आस-पास फटकने न पाए। माता-पिता, रिश्तेदार और गांव के लोगों की मेहनत रंग लाई, आठ लाख किलोग्राम से भी अधिक पैदावार हुई। कमाल हो गया, बंपर फसल उगाने पर शासन ने मिखाइल को ‘ऑर्डर ऑफ द रेड बैनर ऑफ लेबर’ से सम्मानित किया। देश के इस बड़े सम्मान को हासिल करने वाले वह सबसे कम उम्र नागरिक थे। उम्र थी 17 साल। खुद को खड़ा करने की दिशा में यह उनकी पहली विजय थी। यह सम्मान जब मिला, तब मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी से प्रवेश के लिए बुलावा आ गया। इस गंवई किशोर मजदूर-किसान को न तो प्रवेश परीक्षा में बैठना था और न साक्षात्कार में। मेहनत से राह खुल गई। योग्यता तो इतनी थी कि हार्वेस्टर मशीन में कहां खराबी आ रही है, वह महज मशीन की आवाज सुनकर ही बता देते थे, लेकिन उनका मन तो उस देश की पुकार सुनकर परेशान होता था, जहां व्यक्ति की नहीं, महज शासन की मनमानी की कद्र थी। वह कुछ करने और बदलने की सोच के साथ 19 की उम्र में पहली बार मास्को जाने के लिए ट्रेन में चढ़े। पढ़कर मास्को ही नहीं रुके, अपने स्टावरोपोल क्षेत्र में लौटे और जब कम्युनिस्ट पार्टी में भूमिका बढ़ी, तो सबसे पहले अपना जोर किसानों व कृषि सुधार पर लगाया। एक दिन वह भी आया, जब नाना, दादा, पिता के दर्द देख-सुनकर बड़े हुए मिखाइल के हाथों में सोवियत संघ की कमान आई। उन्होंने ज्यादती और जुर्म को रोका। लोकतंत्र को आगे बढ़ाया। दुनिया से शीत युद्ध को खत्म कर, परमाणु होड़ समाप्त कर, जर्मनी की दीवार ढहाकर, अफगानिस्तान से सेना लौटाकर और यूरोप के एकीकरण को बल देकर मिखाइल ने पूरी दुनिया को बदल दिया।

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