मकबूल शेरवानी की कुर्बानी हम कभी भूल नहीं पाएंगे

मकबूल शेरवानी

शहीद सेनानी

तब कश्मीर की खूबसूरत वादियों में भी भारत की आजादी की बयार बहने लगी थी। अपने रंगारंग खुशनुमा मुल्क के ख्वाब देखते उस नौजवान की रगों में वतन के लिए बेहिसाब मुहब्बत ठीक वैसे ही बहती थी, जैसे झेलम में पानी बहता है। बारामूला का वह नौजवान बहुत सजग था कि देश जब आजाद होगा, तब अमन-चैन की जिम्मेदारी सबको निभानी पड़ेगी। फिरकापरस्ती से सबको दो-दो हाथ करने पड़ेंगे।

उन्हीं दिनों बारामूला में कायद-ए-आजम साहब तशरीफ लाए हुए थे। उस नौजवान को यह जुमला बिल्कुल ठीक नहीं लगता था। यह लगातार बंटवारे की बात करने वाला, मजहब की दुहाई देने वाला शख्स पूरे मुल्क का रहनुमा कैसे हो सकता है? इसे लोग कायद-ए-आजम क्यों कहते हैं? यह कैसे कायद, मतलब नेता  है और कैसे आजम, यानी महान है? तब साल 1944, जुलाई का महीना था। वहीं झेलम किनारे कायद-ए-आजम जलसा-ए-आम से मुखातिब थे। वहां बारामूला के वह नौजवान भी लोगों को तोड़ती-बांटती तकरीर को झेल रहे थे। बीच-बीच में मुस्लिम कांफ्रेंस के कारकुन मतलब कार्यकर्ता नारे लगाने लगते थे, कायद-ए-आजम जिंदाबाद। मुस्लिम इत्तिहाद जिंदाबाद। बहरहाल, नारों का शोर जब थमा, तब कायद-ए-आजम ने कहा, ‘मैं बार-बार अपील करता हूं। आप सब मजहब के एक ही परचम तले आ जाइए। तमाम गमों का इलाज यही है कि हम मुस्लिम एक हो जाएं। मुस्लिम लीग की ताकत बढ़ाएं।’

नौजवान से यह बर्दाश्त न हुआ। वह मंच के करीब पहुंच गए और नारा बुलंद  किया, ‘शेर-ए-कश्मीर का क्या इरशाद? हिंदू, मुस्लिम, सिख इत्तिहाद। बांटने की कोशिश नाकाम रहेगी, नाकाम रहेगी। बंट जाएंगे, तो कभी खुश नहीं रह पाएंगे।’

वहां उस नौजवान के साथ एक-दो और साथी भी थे। हाथ-पैर चलने लगे। मामला जब ज्यादा बिगड़ा, तो वह चतुर नौजवान मौका देखते ही कूदते हुए वहां से भागे। उनके पीछे कायद-ए-आजम के मुरीद दौड़े, पर नौजवान में जितना दमखम था, उतनी ही फुर्ती थी। वह तत्काल पास ही बहती झेलम में कूदे और बहते पानी के साथ दुश्मनों की नजर से ओझल हो गए। पीछे से कायद-ए-आजम ने पूछा, ‘यह नौजवान कौन था?’ जवाब मिला, ‘साहब, यह मकबूल शेरवानी है। नेशनल कांफ्रेंस का मामूली कारकुन है।’ कायद-ए-आजम मन मसोसकर रह गए। उनका जलसा-ए-आम बिगड़ गया। बारामूला से श्रीनगर तक बच्चा-बच्चा मकबूल शेरवानी को जान गया। इससे कश्मीर और पूरे भारत के राष्ट्रवादी नेताओं को बहुत बल मिला।

मकबूल शेरवानी ने बारामूला में जो किया, उससे कायद-ए-आजम का यह अहंकार टूट गया कि पूरा कश्मीर मुस्लिम लीग के साथ है। वह समझ गए कि कश्मीर में उनकी दाल आसानी से नहीं गलेगी। असर यह हुआ कि वह मकबूल से बेइज्जत होने के बाद फिर कभी कश्मीर नहीं गए। कहा जाता है कि मकबूल कायद-ए-आजम को जूतों की माला पहनाना चाहते थे।

खैर, देश आजाद हुआ और बंट गया, पर मकबूल की एक ही तमन्ना रही कि कश्मीर भारत के साथ रहे। वह सनातन और सिखों के बिना कश्मीर की कल्पना नहीं कर पाते थे। जब पाकिस्तानी सेना ने लुटेरे-बलात्कारी कबाइलियों की मदद से कश्मीर हड़पने की साजिश रची, तब मकबूल का यह कहना ही सच साबित हुआ कि ये पाकिस्तान मांगने वाले लोग अच्छे व सच्चे नहीं हैं। जब उन्हें लगा कि देश को बचाने के लिए ज्यादा सक्रिय होना पड़ेगा, तब उन्होंने मात्र तीन दिन में मोटरसाइकिल चलानी सीखी। वह जुल्म करने वाले पाकिस्तानी हमलावरों को लगातार इधर-उधर घुमाते रहे। वह चाहते थे कि कश्मीर का जल्द से जल्द भारत में विलय हो और भारतीय सेना श्रीनगर पहुंचकर हवाई अड्डे व अन्य जगहों पर तिरंगा फहरा दे।

उन्होंने किसी तरह पाकिस्तानियों को घाटियों और जंगलों में भटकाए रखा, पर बदकिस्मती से एक दिन उनका राज खुल गया। बेरहम फिरकापरस्तों ने उनको एक दीवार पर कीलों के सहारे ठोक दिया। खुद मकबूल के खून से उनकी कमीज पर काफिर लिख दिया। तरह-तरह से तड़पाया गया कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाओ, तो तुम्हें छोड़ देंगे, पर मकबूल ने आखिरी सांस तक अपने हिन्दुस्तान को जिंदाबाद रखा। बताते हैं, हारे हुए हैवानों ने उनकी देह में 14 गोलियां उतार दीं।

उनकी शहादत नाकाम नहीं गई। तिरंगा जब श्रीनगर होते हुए बारामूला पहुंचा, तब मकबूल की शहादत को पूरी भारतीय सेना ने नम आंखों से सैल्यूट किया। आज भी भारतीय सेना मकबूल शेरवानी को अपना लहू मानती है और जब भी उनके स्मारक के पास से कोई जवान गुजरता है, तो सलामी देना नहीं भूलता।

(हिंदुस्तान में प्रकाशित अपने कॉलम से)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *