दिलीप कुमार पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हैं, पाकिस्तान के दर्शक भी उन्हें अपना कलाकार मानते हैं। पाकिस्तान की धरती और वहां के लोगों के प्रति दिलीप कुमार ने हमेशा प्रेम दर्शाया है। वे कभी भूल नहीं पाए कि वे भी पाकिस्तानी जमीन – पेशावर से भारत आए थे और पूरे होशो-हवाश में आए थे। पाकिस्तान की यादें उनके दिमाग में हमेशा बसी रहीं, उनके दिल ने कभी पाकिस्तान को पराया नहीं माना। अगर हम गौर करें, तो दिलीप कुमार ही नहीं, उनके दौर के बहुत से लोग न कभी कट्टर पाकिस्तानी हो पाए और न कभी कट्टर हिन्दुस्तानी, ये लोग भारत वर्ष में ही छूट गए। वे हमेशा उस अविभाजित भारत के ही नागरिक बने रहे, जिसे सियासत ने साजिश करके मजहब के आधार पर बांट दिया। विभाजन के समय ढेर सारे मुस्लिम पाकिस्तान लौट गए, कलाकारों की दुनिया में भी बंटवारा हुआ, लेकिन दिलीप कुमार ने यह जान लिया था कि कला की बड़ी दुनिया भारत वर्ष की इस विशाल भूमि पर विकसित होगी। उनका आकलन सही साबित हुआ, उन्हें कभी भी भारतीय दर्शकों ने धर्म के आधार पर नहीं आंका। उनकी फिल्मों को उतना ही प्यार मिला, जितना राज कपूर और देव आनंद की फिल्मों को मिला।
पाकिस्तान और भारत की दोस्ती के बारे में वे हमेशा सोचते रहे और इसमें जहां तक हो सका, उन्होंने अपना सहयोग दिया। भारत और पाकिस्तान की मैत्री के सतत प्रयास करने वाला उनके जैसा कोई दूसरा अभिनेता न तो सीमा के इस पार हुआ और न उस पार। जब दुश्मनी की बयार चलती थी, तब भी दिलीप कुमार दोस्ती की धुन में मस्त रहते थे, वे दोस्ती के प्रति कभी निराश नहीं हुए। वर्ष 1999 में जब कारगिल संघर्ष के बाद देश में पाकिस्तान के खिलाफ माहौल था, शिव सेना इत्यादि पार्टियों ने साफ-साफ कहा कि दिलीप कुमार पाकिस्तान द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ लौटा दें, लेकिन दिलीप कुमार ने तब भी भारत-पाकिस्तान की मैत्री की ही बात की और साफ कर दिया कि बांटने की राजनीति उन्हें बदल नहीं सकती।
वैसे यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि पाकिस्तान ने दिलीप कुमार के काम, योगदान, बयान से कुछ भी नहीं सीखा। पाकिस्तान के लोग बस इसी बात में मस्त रहे कि ये उनके धर्मभाई यूसुफ खान हैं, जो भारतीय फिल्म दुनिया पर राज कर रहे हैं। उनकी यह धारणा है कि यह महानायक पाकिस्तान की जमीन पर जन्मा है, तो पाकिस्तान का ही है। जबकि वास्तव में दिलीप कुमार पाकिस्तान की जमीन पर नहीं, अविभाजित भारत की जमीन पर जन्मे थे। किसी को भी इस बात पर आश्चर्य होगा कि दिलीप कुमार ने करीब 61 फिल्मों में काम किया, जिसमें से केवल तीन ही फिल्मों में उन्होंने हिन्दू का किरदार नहीं निभाया। वर्ष 1960 में बनी ‘मुगल-ए-आजम’ में शहजादा सलीम के उनके किरदार से सभी परिचित है, लेकिन उनके द्वारा निभाया गया कोई अन्य मुस्लिम चरित्र लोगों को याद नहीं होगा। फिल्म दुनिया में आने के 11 साल बाद 1955 में उन्होंने पहली बार किसी मुस्लिम का किरदार निभाया। इस वर्ष फिल्म ‘आजाद’ में अब्दुल रहीम खान की भूमिका निभाई, हालांकि इस फिल्म में वे एक हिन्दू किरदार में भी रहे। 1958 में आई ‘यहूदी’ में वे शहजादा मार्कस के किरदार में रहे।
बहुतों को आश्चर्य होगा कि भारतीय यूसुफ खान ने जगदीश (फिल्म – ज्वार भाटा – वर्ष 1944) के किरदार से फिल्मों में शुरुआत की थी और जगन्नाथ (फिल्म – किला – 1998) के किरदार के साथ विदा हुए। दिलीप कुमार को मजहबी नजरिये से देखने वाले आश्चर्य करेंगे कि राम, रमेश, गंगाराम, श्याम, मोहन और शंकर जैसे नाम उन पर खूब जमते थे। वे कम से कम तीन बार राम बने और तीन बार शंकर।
इन तथ्यों की रोशनी में अगर हम दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर चर्चा करें, तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में उनके सामने कोई नहीं टिकता। यदि पाकिस्तान के लोग भारतीय दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर थोड़ी भी निगाह डालेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि भारत वास्तव में किस चीज का बना है और धर्मनिरपेक्षता किसको कहते हैं। दिलीप कुमार एक प्रतीक हैं, जिन पर भारतीयता गर्व कर सकती है। भारत में प्रगतिशील सामाजिकता के निर्माण में उनका योगदान सर्वाधिक है, वे सांप्रदायिक घृणा की दीवारों को गिरा देते हैं। उनके बारे में कोई भी यह नहीं कह सकता कि राम, श्याम, शंकर इत्यादि नाम से किरदार निभाने में उनका क्या योगदान है। हमें यह पता होना चाहिए कि निर्माताओं और निर्देशकों से बहुत विचार-विमर्श के बाद ही दिलीप कुमार किसी फिल्म में अभिनय के लिए तैयार होते थे। वे न केवल अपने किरदार में बदलाव करते थे, बल्कि वे कहानी में भी बदलाव करते थे, अपनी फिल्म की पूरी योजना में वे शामिल रहते थे। इसलिए जो नाम उन्होंने अपने किरदारों के लिए चुने, उसके लिए उन्हें पूरा श्रेय देना चाहिए। दरअसल, उन्हें पता था कि कौन-सा नाम किस किरदार के ज्यादा मुफीद रहेगा और किन नामों की पहुंच लोगों तक सबसे ज्यादा होगी। वे चाहते, तो ऐसे नाम भी चुन सकते थे, जिनमें किसी हिन्दू ईश्वर के नाम का स्पर्श नहीं होता, लेकिन फिल्मों के प्रभाव के बारे में उनकी समझ बेमिसाल थी। उनके किरदारों के नाम भले राम, रमेश, शंकर, श्याम रहे, लेकिन उन्हें भारतीय मुस्लिम समाज ने भी दिलोजान से पसंद किया। उन्हें यह बात कभी नहीं चुभी की कोई यूसुफ खान राम, रमेश, शंकर, श्याम की भूमिका क्यों निभा रहा है। यही भारतीय समाज की ताकत है। भारतीय समाज को अपना सकारात्मक संदेश देने में दिलीप कुमार एक विचारवान अभिनेता के रूप में बहुत सफल रहे।
निश्चित रूप से भारतीय समाज में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। सामाजिक समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र प्रेम के मामले में भी उनका योगदान अतुलनीय है। आप क्रांति (1981) देखिए या कर्मा (1986) दिलीप कुमार अपने अनुपम अभिनय से देश प्रेम को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा देते हैं कि हर दिल उनके साथ गा उठता है :
हम जीयेंगे और मरेंगे,
ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे,
ऐ वतन तेरे लिए।
दिलीप कुमार का जो वतन है, उसमें पाकिस्तान अनायास शामिल है। वे पाकिस्तान को अलग रखकर सोच ही नहीं सकते, पाकिस्तान को अलग रखकर सोचना उनके लिए अपने आप को बांटकर सोचने जैसा है। उनके लिए मजहब के खांचे में सोचना मुश्किल है, इस गीत को दिलीप कुमार आगे बढ़ाते हैं –
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम वतन हम नाम हैं,
जो करे इनको जुदा
मजहब नहीं इल्जाम है।
कट्टरता बहुत टुच्ची चीज होती है, उदारता – सहिष्णुता सदैव महान होती है। बहुत सारे लोग यह सपना देखते थे कि पाकिस्तान और भारत में दोस्ती हो जाएगी, कई लोगों का यह सपना समय के साथ टूटता गया। एक युद्ध, दो युद्ध, छद्म युद्ध और फिर सतत आतंकवाद ने पूरी दुनिया को पाकिस्तान के बारे में फिर से सोचने पर विवश कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार ने कभी यह आभास नहीं होने दिया कि वे अपनी सोच बदलने पर काम कर रहे हैं। दिलीप कुमार जैसों के बारे में वे लोग कभी ईमानदारी से नहीं सोच पाएंगे, जो 1947 के बाद पैदा हुए हैं। हालांकि 1947 से पहले ही अपना विचार पुख्ता करने वाले ऐसे लोग ज्यादा रहे हैं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग खांचों पर रहकर सोचना शुरू कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार वाली जमात भी रही, जो चाहकर भी अलग-अलग खांचों में नहीं सोच पाई। उनकी मानसिकता में वह विशाल देश ठहर-सा गया, जो वाकई सदियों से महान था। वह ऐसा महान देश था, जिसमें कभी घृणा के बीज जड़ें नहीं जमा पाए, घृणा के थपेड़ों को पछाड़ कर वह महान देश आगे बढ़ता गया। दुर्भाग्य से बाद में वह बंटा, नतीजतन कुछ लोग टूट गए, लेकिन कुछ लोग नहीं टूटे, उनमें से एक नाम दिलीप कुमार हैं। दौर कोई भी हो, प्रेम का स्थान घृणा से सदैव ऊपर रहेगा, दोस्ती का स्थान दुश्मनी से सदैव ऊपर रहेगा।
बेशक, यह अच्छा हुआ कि दिलीप कुमार पाकिस्तानी जमीन पर नहीं गए, वहां चले जाते, तो वे इतने बड़े कलाकार कभी नहीं हो पाते, यह वास्तव में पाकिस्तान के लिए भी लाभकारी रहा। पाकिस्तान के लोग जब भी पलटकर दिलीप कुमार का ईमानदार अध्ययन करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने क्या खो दिया और उनके बड़े पड़ोस ने क्या खूब पा लिया। आज हिन्दुओं के बीच एक यूसुफ खान है, जो बताता है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कैसा होना चाहिए।
(अपनी पुस्तक सिनेमा हिन्दुस्तानी से)







