लेखन व लेखकों से जुड़ी नकारात्मक प्रवृत्तियां
अखबारों में लिखने वालों से जुड़ी अनेक तरह की नकारात्मक प्रवृत्तियां यदा-कदा नजर आ जाती हैं, जिससे पत्रकारिता के संपूर्ण न हो पाने का अहसास गाढ़ा हो जाता है। लेखकों को जागरूक और अच्छा इंसान माना जाता है, इसलिए उनसे उम्मीदें भी बहुत होती हैं, लेकिन ज्यादातर वे पूरी नहीं होती हैं। आइए, कुछ बड़ी नकारात्मक प्रवृत्तियों के बारे में बात कर लेते हैं, ताकि सुधार की कोशिश कर सकें।
मुफ्त लिखने का रिवाज जो लेखक यह समझते हैं कि केवल लेख छप जाए, उसके बदले कोई धन न मिले, तो भी चलेगा, वास्तव में वे न केवल लेखन व्यवस्था को खराब करते हैं, बल्कि अन्य लिखने वालों के जीवन या पेशे को मुश्किल में डालते हैं। मुफ्त में लिखने की इच्छा पेशेवर रवैया नहीं है। अक्सर मुफ्त में लिखने की इच्छा रखने वाले लेखक ज्यादा मेहनत नहीं करते हैं, दूसरों की देखा-देखी कामचलाऊ लिखते हैं।
केवल लिखने का शौक नहीं होना चाहिए, बल्कि अच्छा लिखने का शौक होना। चाहिए। पत्रकार होने या पत्रकारिता से जुड़ने के लोभ में स्वांतः सुखाय, खराब या मनमाना लेखन करना ठीक नहीं है। वास्तव में लेखकों को कभी मुफ्त में नहीं लिखना चाहिए और अपनी लेखनी में इतना बल पैदा करना चाहिए कि उसकी मांग हो और अच्छा-खासा मानदेय भी प्राप्त हो। साथ ही, मानदेय में समय के साथ बढ़ोतरी के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
हल्का लिखना और दबाव बनाना
कई लेखक हल्का या सतही लिखते हैं, लेकिन पृष्ठ संपादकों या प्रभारियों पर लेख छपवाने के लिए दबाव डालते हैं। तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। फोन करवाते हैं, प्रबंधकों या मालिकों के पास शिकायती पत्र लिखते हैं। अखबार में लेखों या फीचर के चयन पर सवाल उठाते हैं। ऐसे लेखकों से सावधान रहना चाहिए। जो बार-बार फोन करे, दबाव डाले, वह वास्तव में अच्छा लेखक नहीं हो सकता।
अच्छा लेखक जब कोई लेख लिखता है, तो अव्वल तो प्रकाशन को लेकर आश्वस्त रहता है, कभी तकादा नहीं करता और अगर लेख नहीं छपता है, तो भी अच्छा लेखक यह मान लेता है कि उसका लेख किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो सका। वह दूसरे अच्छे लेख की तैयारी में लग जाता है। जबकि खराब लेखक एक लेख लिखकर उसे छपवाने के हठ पर अड़ जाता है, आगे नहीं बढ़ता, खुद अपना अहित करता है, अपनी छवि बिगाड़ता है। ऐसे नासमझ को कदापि बढ़ावा नहीं देना चाहिए। प्रकाशन में भ्रष्टाचार
जिन लोगों का लेखों या फीचर प्रकाशन से वास्ता है, उनके सामने अक्सर ऐसे शौकिया लेखक भी आते हैं, जो कहते हैं, \’आप मेरा लेख/फीचर छाप दीजिए, पैसा/मानदेय आप रख लीजिए, मुझे वह नहीं चाहिए।\’ ऐसे लेखकों से बचना चाहिए। यह भ्रष्टाचार है, पत्रकार को भ्रष्ट बनाने की साजिश है। अच्छे संपादकों को ध्यान रखना चाहिए, कई पत्रकार लेख छापने के लिए लेखक के सामने यह शर्त रखते हैं कि लेखक अपने मानदेय में से उसे भी एक हिस्सा देगा। कमजोर व शौकिया लेखक इसके लिए भी तैयार हो जाते हैं। कई लेखक संपादकों या पत्रकारों को उपहार भी देते हैं, लेकिन किसी भी तरह का उपहार लेने से पहले लेखक की भावना को समझना चाहिए। अगर उपहार बिना स्वार्थ दिया जा रहा हो, तो उसमें बुराई नहीं है। उपहार के सम्बन्ध में संस्थान आचार संहिता बना सकते हैं और उसका पालन संस्थान के प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। भ्रष्टाचार तभी रुकेगा, जब ऊपर से नीचे तक सभी ईमानदार हों और काम में पारदर्शिता बरतें।








