
उस दोपहर रायपुर के बूढ़ापारा में उस मकान को खोज रहा हूं, जहां कभी रहते थे किशोर विवेकानंद अर्थात नरेंद्र नाथ। उस सरोवर से पैदल चलते हुए उनकी गली में पहुंचा हूं, जहां कभी वह रोज नहाते थे। सरोवर पर भी प्यार उमड़ रहा है और उस गली पर भी। हालांकि, घर वाली गली में खूब सारी दूकानें खुल आई हैं, उस भवन में स्कूल चल रहा है, जहां 1877 से 1879 तक रहे थे नरेंद्र नाथ।
तब रायपुर की आबादी बमुश्किल 19,000 थी, अब तो बूढ़ापार की आबादी ही इससे कई गुना ज्यादा है। जब 14 साल के किशोर नरेन्द्र नाथ रायपुर आए, तब शायद ही यहां किसी को आभास रहा होगा कि वह अपनी वैश्विक पहचान बनाएंगे। नरेन्द्र अपने पिता विश्वनाथ दत्त सहित मां भुवनेश्वरी देवी, छोटे भाई महेन्द्र व बहन जोगेन्द्रबाला के साथ यहां रहते थे। वकील पिता को रायपुर रहना था, तो उन्होंने परिवार को भी यहीं बुला लिया था। आज रायपुर और नागपुर के बीच लाखों गाड़ियां रोज दौड़ती हैं, लेकिन तब नागपुर से नरेंद्रनाथ परिवार के साथ बैलगाड़ी में बैठकर रायपुर आए थे।
बूढ़ापारा के इस घर का नाम डे भवन है। नरेंद्र नाथ के पिता के मित्र थे भूतनाथ डे, जिनके घर नरेंद्रनाथ का परिवार ठहरा था। स्वामी विवेकानंद की यादों को मिटा दिया गया है। अब जो मकान मालिक हैं, उन्हें भय रहता है कि कहीं सरकार इस घर को छीन न ले। कहीं कोई पहचान या प्रतीक यहां दर्ज नहीं है, जिससे पता चले कि नरेंद्र नाथ यहां रहे थे। जानने वाले भी यह बताने में हिचकते हैं। सरकार को भी ज्यादा परवाह नहीं है, उसने पास के सरोवर का नाम विवेकानंद सरोवर रख दिया है, तालाब के बीच टापू पर विवेकानंद की सुंदर प्रतिमा विराजमान है।
रायपुर में रामकृष्ण आश्रम की मजबूत स्थिति है। रायपुर एयरपोर्ट का नाम भी विवेकानंद के नाम पर है। अनेक संस्थानों के नाम उनके नाम पर रखे गए हैं, लेकिन जहां वह रहे थे, उसे लोग दूर से ही देखकर निकल जाते हैं कि यहां कभी रहे थे स्वामी विवेकानंद।
काश, वहीं एक छोटी सी जगह विवेकानंद के लिए निकल आए, लेकिन ऐसा करने के अपने खतरे हैं। इसमें यह जगह छिन जाने का खतरा भी है।
रायपुर में स्वामी विवेकानंद की स्कूल शिक्षा संपन्न हुई थी और वह यहां से कोलकाता जब गए, तो कॉलेज में प्रवेश लिया और उसके बाद दो साल बाद 1881 में गुरु रामकृष्ण परमहंस से उनकी मुलाकात हुई और जिंदगी पूरी तरह से बदल गई।
खैर, जब समाचार पत्र पत्रिका में मेरे निर्देश पर कुछ खबरें छपीं, तो उसे यहां के अधिकारियों ने भी अच्छे भाव से नहीं लिया। डे भवन अब स्कूल का हिस्सा है और वहां प्रबंधन में तो खास बेचैनी देखी गई। खबर को रुकवाने की कोशिश से लेकर असहयोग तक किया गया। खैर, शहर अपने ढंग से स्वामी विवेकानंद से जुड़ी यादों को समेटे हुए है। आज रायपुर में आबादी 16 लाख से ज्यादा है, बहुत फैल गया है शहर, लेकिन बूढ़ापारा की वह गली आज भी इतिहास का एहसास कराती है। महसूस होता है कि इस गली में ऐसा कोई रहा था, जो दुनिया के लिए यूथ आयकन हो गया था।
वैसे मैं साल 2002 में कन्याकुमारी भी गया था, जहां स्वामी विवेकानंद गए थे और वहां उनकी विशाल प्रतिमा समुद्र के बीच चट्टान पर खड़ी है। वहां उनका संगठन भी बहुत मजबूत और सक्रिय है। लगभग तीन साल देश में घूमते रहे थे स्वामी विवेकानंद और सनातन धर्म की ताकत को सही अर्थों में उन्होंने साकार किया था। उनके जन्मदिन को युवा दिवस के रूप में मनाना और उन्हें याद करना बहुत ही प्रशंसनीय और प्रभावी है। वह भारत के सच्चे नायक प्रतिनिधि हैं।






