संपादन की समस्या और समाधान-3

प्रूफ की समस्या

पत्रकारिता में प्रूफ की समस्या शास्वत है। प्रूफ की गलती तब भी होती थी, जब प्रूफ के अलग विभाग हुआ करता था और अब भी होती है। अब प्रूफ का काम भी सम्पादकों के जिम्मे आ गया है। सम्पादकों में बहुत कम ऐसे होते हैं, जो प्रूफ को अपना काम मानते हैं। जिन समाचार कार्यालयों में सम्पादकों ने प्रूफ को अपना काम नहीं माना है, वहां प्रूफ की गलतियां अभी भी हो रही हैं। क्या आज कोई पत्रकारिता शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान प्रूफ पढ़ने के गुर सिखाता है? जब कोई सिखाने वाला नहीं है, जब कोई मन से सीखने को या प्रूफ रीडर बनने को तैयार नहीं है, तो फिर प्रूफ की समस्या तो स्वाभाविक है। चूंकि पत्रकारिता पूर्ण व्यावसायिक रूप लेती जा रही है, इसलिए प्रेस स्वामियों को प्रूफ रीडरों को हटाने का काम लागत कम करने का एक सहज उपाय लग रहा है। कई बार प्रूफ की गलती की वजह से कोई अच्छा काम, खबर या पृष्ठ भी किसी को दिखाने या बताने लायक नहीं रहता है। प्रूफ की गलती अच्छे-अच्छे सम्पादकों को भी शर्मिंदा कर देती है।

समाधान : समाचार पत्र के क्षेत्र में वास्तव में प्रूफ कला का स्वतंत्र अस्तित्व मुश्किल से सौ साल तक रह सका है। धीरे-धीरे यह कला अंत की ओर है, सम्पादकों को जल्दी से जल्दी इस कार्य को अपने माथे लेना होगा, ताकि प्रूफ की समस्या से निजात मिले। सम्पादकों की पुरानी पीढ़ी प्रूफ रीडरों के भरोसे ही काम करती थी, लेकिन अब यह महत्वपूर्ण काम सम्पादन डेस्क की जिम्मे आ गया है। रिपोर्टर गलत से गलत लिखेगा, ढेर सारी गलतियां करेगा, लेकिन सुधारने का काम सम्पादन डेस्क का है। पृष्ठ पर जो छपता है, उसके लिए वास्तव में सम्पादन डेस्क ही जिम्मेदार है। अगर एक भी शब्द गलत छप रहा है, तो उसके लिए सम्पादक ही जिम्मेदार है। सम्पादकों ने ही प्रूफ रीडरों को तैयार किया था। और अब जब वे प्रूफ रीडरों की जरूरत नहीं कर रहे हैं, तो जाहिर है, प्रूफ रीडर का काम करने को तैयार रहना होगा। कई समाचार पत्र कार्यालयों में चूंकि कंपोजिंग का काम सम्पादन डेस्क या रिपोर्टर ही करने लगे हैं, तो फिर भविष्य में प्रूफ का काम भी उन्हें ही करना है।

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प्रूफ पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ना चाहिए। प्रूफ की गलती तब होती है, जब पढ़ते हुए ध्यान कहीं और चला जाता है। सम्पादन डेस्क पर कार्यरत पत्रकारों के लिए पूरी तन्मयता से गलतियों को खोज निकालने और ठीक करने का हठ बहुत जरूरी है। अपने काम से संतुष्ट सम्पादक प्रूफ में अकसर गलती करते हैं, अतः ऐसे सम्पादकों को विशेष रूप से सचेत रहना चाहिए और अपनी कॉपी दूसरों को जांचने के लिए अवश्य देनी चाहिए, अपनी गलती कई बार खुद को नजर नहीं आती है, लेकिन दूसरे उसे आसानी से पकड़ लेते हैं। खबर का अंतिम स्वरूप कम से कम दो डेस्क पत्रकारों की नजरों से होकर गुजरना चाहिए।

(अगली बार पढ़िए – खबर काटने में असावधानी और समाधान)

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