गालियां स्वभाव या संस्कार का हिस्सा हैं। हर कोई गाली नहीं दे सकता। जो लोग दूसरों के प्रति सद्भाव से भरे होते हैं, वो कभी गालियां नहीं देते हैं। जिनके पास सद्भाव नहीं होता, जिनके पास दूसरों के लिए प्रार्थनाएं नहीं होती हैं, जिनके पास दूसरों को देने के लिए कुछ नहीं होता है, उनकी पास गालियां होती हैं।
अक्सर ऐसा भी होता है, जब शब्द विफल हो जाते हैं, तब अपशब्दों से काम लिया जाता है। हालांकि, अपशब्दों से काम लेना भी एक आधुनिक हुनर है। आजकल देखने में आ रहा है कि ऐसे हुनर का प्रदर्शन छोटी-छोटी लड़कियां भी करने लगी हैं। ऐसी ही एक लड़की को जंतर-मंतर पर मुंह से फूल बरसाते देखा गया था। जब उसकी खूब निंदा हुई, तब उसने माफी मांगी। भला हुआ, प्रधानमंत्री ने भी गालीबाज बच्चों को आम माफी दे दी। मामला रफा-दफा हो गया। पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया, पर ध्यान रहे, समाज कुछ चीजों को भूलता नहीं है। माफ करना भी एक हुनर है, हर किसी को यह नहीं आता है। बहुत से लोग हैं, जिन्होंने अंधाधुंध गालियां देने वालों को माफ नहीं किया है। उनकी भी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, बशर्ते वो कानून हाथ में न लें।
कुछ गलतियां पीछा नहीं छोड़तीं, उनकी सजा ताउम्र भुगतनी पड़ती है। लोग पीढ़ियों तक याद रखते हैं। लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई। यह एक सबक है, जो कतई नया नहीं है। आदिकाल से यह कहा जाता रहा है कि बोलने से पहले सोच लो। एक बार शब्द मुंह से निकल जाएंगे, तो फिर न लौटेंगे। असली वाण से लगे घाव भर जाते हैं, पर शब्दवाण के घाव हमेशा हरे रहते हैं।
अफसोस, मामला फिर गरमाया है। प्रधानमंत्री के लिए उस लड़की ने अब बहुत कुछ कहा है। माफ करने वाले प्रधानमंत्री को कायर भी कहा है। उस किशोरी को पलटकर नहीं आना चाहिए था। जंतर-मंतर की बात पीछे रह जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा लगता है, उस किशोरी को अपनी गलती का एहसास नहीं है। वह प्रधानमंत्री को ही गलत मान रही है। अपनी करनी की अघोषित सजा के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहरा रही है। दरअसल, यह जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व के अभाव का संकेत है, जो इधर नई पीढ़ी में अक्सर देखा जा रहा है। देश के प्रति एक जिम्मेदारी है, उत्तरदायित्व है, इसका एहसास अगर न हो, तो जिंदगी में मुश्किलों का बढ़ना तय है।
अफसोस, उस किशोरी ने अपने जहरीले अपशब्दों को फिर जीवित कर दिया है। उसके द्वारा किया गया ताजा हमला, उसकी माफी और उसकी गालियां, तीनों को फिर बार-बार सुना जा रहा है। यह स्थिति किशोरी के लिए ठीक नहीं है। यह अपरिपक्वता है। उसे सद्बुद्धि हो। उसके अभिभावक संवेदनशील हों।
अब क्या होगा? शायद, उस किशोरी के पीछे विपक्षी पार्टियां खड़ी हो गई हैं, जो यह मानती हैं कि बार-बार चुनावी हार के बाद अब शब्द नहीं, अपशब्द काम करेंगे। तमीज काम नहीं करेगी, बदतमीजी काम आएगी। जो विपक्षी दल उस किशोरी का दुस्साहस बढ़ा रहे हैं, उन्हें उसका खयाल भी रखना चाहिए। उसकी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ेगी। अक्सर ऐसा होता है कि राजनीतिक दल किसी न किसी आम नागरिक का इस्तेमाल कर उसे भंवर में छोड़ देते हैं।
इस बीच, ऐसा लगता है कि देश में गालियों का भविष्य उज्ज्वल है और राजनीतिक पार्टियां इसे प्रश्रय देंगी। संघर्ष के अच्छे साधन और माध्यम चूकने लगे हैं। सत्ता में इतना ज्यादा पैसा है कि सत्ताहीनों के सब्र का बांध टूटने लगा है। सब्र का बांध टूटेगा, तो क्या हम जरूरी शालीनता भी खो देंगे?
चिंता व्यापक है। अगर देश के प्रधानमंत्री को पड़ रही गालियां हमें नहीं चुभ रही हैं, तो हम शायद किसी स्थायी कुंठा या घृणा के शिकार होने लगे हैं। असहमत होना अपनी जगह है, लेकिन अपशब्दों का इस्तेमाल करना हर हाल में निंदनीय है। आखिर समाधान क्या है? देश की हर बीमारी का इलाज हम लोगों के पास है, लेकिन क्या हम लोगों में जरूरी जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व का भाव है? क्या हम केवल अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं? क्या हम देश का हित नहीं देख पा रहे हैं? क्या हम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और केवल सरकार से उम्मीद लगाए हुए हैं?








