जब पिता के पात्रों से परेशान हुआ पुत्र
साहित्यकार
अपने जमाने में पिता मैट्रिक पास थे, पर न जाने क्यों कहीं पक्की नौकरी नहीं लगती थी। गरीबी किसी चिपकू रिश्तेदार की तरह बार-बार लौट आती थी। पिता की पढ़ाई के चलते उनकी शादी अच्छे बड़े घर में हुई थी और वह बड़ा घर ही सहारा बनता था। एक बार तो ऐसी नौबत आई कि कर्ज चुकाने के लिए बंगाल के देबानंदपुर गांव स्थित पैतृक मकान को पिता ने मात्र 225 रुपये में बेच दिया और परिवार लेकर आ गए ससुराल भागलपुर। यहां कम से कम बच्चों को खाने-पीने का अभाव नहीं था।
उसी घर के एक कमरे में पिता समय बचाकर कुछ-कुछ लिखते थे। बाकी समय यह सोचकर कहीं न कहीं काम पर जाते थे कि ससुराल पर ज्यादा भार नहीं बनना है। उनका बड़ा बेटा किशोर हो चला था, जिसे अक्सर सताते अभावों ने समय से पहले समझदार बना दिया था। वह समझदार किशोर अक्सर पिता की रचनाओं को पढ़ता था। कभी कहानी, कभी कविता, तो कभी नाटक, पर समस्या यह कि कोई भी रचना पूरी नहीं होती थी। किशोर को महीनों तक यही लगता रहा कि पिता किसी दिन अपनी तमाम रचनाओं को संपूर्णता देना शुरू करेंगे। अक्सर पिता ऐसा गजब लिखते थे कि उनके किशोर बेटे की नींद उड़ जाती थी। वह रात-रात भर सोचता रह जाता था कि उस कथा के फलां गरीब पात्र को किसी ने आश्रय दिया या नहीं? उस महिला को उसके प्रेमी ने कहीं धोखा तो नहीं दे दिया? पिता की अधूरी कहानियों के पात्र पुत्र को परेशान करने लगे और एक दिन यह विचार मन में कौंधा कि क्यों न इन भटकते किरदारों को मंजिल तक पहुंचाया जाए? मन ही मन में किरदारों को मंजिल पर पहुंचाने की कोशिश से पहला फायदा यह हुआ कि मन को सुकून मिला। दूसरा फायदा यह हुआ कि वह जान पाया कि उसमें कहानियों को अंजाम तक पहुंचाने की क्षमता है। मन ही मन में कहानी पूरी कहने की शुरुआत हुई और एक कथाकार ने अवतार लिया।
खुद कहानी लिखने की संकोच भरी शुरुआत हुई। यहां-वहां अनौपचारिक ही एकाध कहानियां प्रकाशित हुईं, पर विश्वास का अभाव था। खैर, रुकते-घिसटते अनेक स्कूलों में पढ़ते किसी तरह बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी हुई और गरीबी ने उसे भी काम पर लगा दिया। वह भी काम के लिए यहां-वहां भटकने लगा। मां न रहीं, तो भागलपुर भी छूट गया। उसे बहुत दर्द हुआ, जब पूरा परिवार बिखर गया। पिता अपने ही गांव में किराये पर, बड़ी बहन कहीं, दो छोटे भाई कहीं, तो छोटी बहन अलग। कुछ पैसे कमाने की कोशिश में वह पहले कोलकाता और फिर रंगून पहुंचा।
उसके पास हमेशा कुछ कहानियां रहती थीं, कुछ दूसरे नामों से छपी भी थीं, पर अपने नाम को आगे बढ़ाने का साहस न था। बांग्ला समाज का माननीय भद्र लोक एक गरीब-श्रमजीवी के साहित्य को पता नहीं किस निगाह से देखेगा? इसी संशय में समय खर्च हुआ जा रहा था। एक बार वह छुट्टियों में बंगाल आया, तो उसके पुराने मित्रों ने आग्रह किया। मित्र एक साहित्यिक पत्रिका निकाल रहे थे, तो उन्होंने घेरकर अपने अप्रकाशित-लेखक मित्र से वादा ले लिया। लेखक मित्र भी यह सोचकर रंगून लौट गया कि मित्र वादा भूल जाएंगे, पर रंगून पहुंचते ही मित्रों के पत्र आने लगे और टेलीग्राम भी कि जल्दी कहानी भेजो, वरना अनर्थ हो जाएगा। मजबूर लेखक ने एक कहानी भेज दी, जो जमुना पत्रिका में बिंदुर छेले शीर्षक से प्रकाशित हुई और चल निकली। पहली बार बांग्ला समाज ने उस कहानी के साथ अपने एक अद्भुत कथाशिल्पी का नाम पढ़ा– शरत चंद्र चट्टोपाध्याय। संवेदनाओं में सराबोर सृजन का नव-प्रकाश फैल गया। एक बालक है, बिंदुर छेले अर्थात बिंदु का लड़का, जो अपनी मां काे दीदी मानता है और अपनी बिंदु चाची को मां कहता है।
बिंदुर छेले की ख्याति के बाद शरत चंद्र की रचनाएं लगातार प्रकाशित होने लगीं। लेखन से कमाई भी इतनी होने लगी कि वह 37 की उम्र में रंगून से काम छोड़कर कोलकाता आ गए और स्वयं को साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। लेखन ने उन्हें संपन्न बनाया, लेखन से ही उनका दोमंजिला मकान बना, जिसमें उनके बिखरे हुए संयुक्त परिवार की खुशहाल वापसी हुई।
15 सितंबर को जन्म लेने वाले शरत चंद्र (1876-1938) की रचनाओं पर 40 से अधिक फिल्में बन चुकी हैं और अभी भी बन रही हैं। हृदयस्पर्शी उपन्यास देवदास, परिणीता से श्रीकांत तक उनकी ख्याति अमर है। अपने अंतिम दिनों में शरत चंद्र अक्सर अपने पिता को याद करते हुए कहते थे, ‘पिता ने ही मुझे आवारापन दिया, स्वप्नदर्शी बनाया। मैं उनकी रचनाओं के अधूरेपन पर पछताते हुए कई रात जागता रहता था और सोचता था कि अगर वे पूरी हो जातीं, तो उनका क्या अंत होता?’ वाकई जिंदगी बहुत कुछ देती है, पर कुछ अफसोस रह ही जाते हैं।








