मंदिर, शीतलपुर बाजार, Sheetalpur Bazar, ब्लॉक मांझी, जिला – सारण, बिहार
(साल 2008 का लिखा हुआ)
जाति कहीं हमारे संस्कारों में शामिल है, लेकिन मैंने ईमानदार आत्मसमीक्षा के बाद यह महसूस किया है कि मेरे दिल में भी जाति के कुछ जर्रे विद्यमान हैं, हालांकि वे प्रभावी कभी नहीं रहे। जब वे जर्रे जोर मारते हैं, तो मैं दलितों की दुर्दशा का ध्यान करने लगता हूं। एक सहज उपाय यह है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा `जूठन´ पढ़ लेता हूं और धरातल पर आ जाता हूं। `जूठन´ के बारे में यह कहना चाहूंगा कि यह रचना हर उस सवर्ण मानसिकता वाले व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, जिसे अपनी श्रेष्ठता का गुमान है । `जूठन´ को पढ़ते हुए कम से कम तीन-चार जगहों पर मेरी आंखों में आंसू छलक आते हैं, दिल रोता है, एक अजीब-सा अपराध बोध जागता है। हालांकि मैंने अपने गांव (शीतलपुर बाजार, जिला : छपरा) में जातिवाद के वैसे दृश्य नहीं देखे हैं, जैसे दृश्य `जूठन´ में सामने आते हैं। `जूठन´ का जो दौर है, वह 1960 के दशक का है। हालांकि अभी भी कई गांवों में `जूठन´ का दौर जारी होगा, लेकिन बेगार यानी मुफ्त में काम लेने की परंपरा लगभग खत्म होने के कगार पर होगी। दलितों के पक्ष में बने कानूनों ने बहुत प्रशंसनीय काम किया है, उसका दुरुपयोग हुआ है, लेकिन अगर सवर्णों द्वारा किए गए अन्यायी अत्याचार के संदर्भ में देखें, तो इन दुरुपयोगों ने भी समाज की बेहतरी की दिशा में काम किया है। दलितों के शोषण के प्रति एक भय आया है, इस भय का स्वागत है। मैं लालू प्रसाद यादव और मायावती का आलोचक हूं, क्योंकि इनका आर्थिक विकास की राजनीति से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन मैं इन जैसे नेताओं का इस बात के लिए ऋणी हूं कि इन्होंने मेरे समाज को लोकतांत्रिक बनाने में योगदान दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर), बिहार में दलित, चूहड़े, चमार, डोम इत्यादि को भी समान अधिकार रखने वाला इनसान मानने का संस्कार जड़ें जमाने लगा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हालात सुधरे हैं, लेकिन `जूठन´ वाला दौर अभी पूरी तरह से बीता नहीं है।
मेरा गांव यानी शीतलपुर बाजार एकमा रेलवे स्टेशन (सिवान और छपरा के बीच) से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ता है, यहां दलितों में पर्याप्त जागृति आई है। जिन परिवारों में अक्षर का प्रवेश हुआ है, उन्होंने तरक्की की है और सुखी हैं, उन्हें कोई नहीं छेड़ता, लेकिन जिन परिवारों ने पढ़ाई का मोल नहीं समझा, उनकी हालत खराब है। मेरे गांव में एक अच्छी बात यह है कि पीडि़त जातियों को पढ़ाई से रोकने का दुस्साहस किसी में नहीं है। गांव के स्कूल में मास्टर भी हर जाति वर्ग से आते हैं, अत: वहां भेदभाव की गुंजाइश न के बराबर है। बिहार गरीबी के लिए बदनाम है, लेकिन जितने भी दिन मुझे गांव में रहने का मौका मिलता है, भयानक किस्म की गरीबी नजर नहीं आती। अभाव जरूर है, लेकिन भूख से किसी की मौत मैंने नहीं सुनी। हालांकि हमारे यहां जब जनेऊ, शादी जैसे अवसर आते हैं, तब मैंने ध्यान दिया है, ढेर सारे गरीब भी अंधेरे में आकर बैठ जाते हैं। बचपन में मुझे आश्चर्य होता था, इतने सारे गरीब कहां से आ जाते हैं, मैं बाबूजी (बड़े पिताजी) से पूछता था, जवाब मिलता था, `ये आसपास के गांव से भी आते हैं। अपने लिए और परिवार के लिए खाना ले जायेंगे ´। जवानों को तो नहीं, लेकिन गरीब बुजुर्गों और बच्चों को मैंने भोजन की प्रत्याशा में बैठे देखा है। हालांकि जूठन की प्रत्याशा में कोई नहीं होता, उन्हें ताजा भोजन ही मिलता है। मुझे ऐसा लगता है, बड़ जातियों को सम्मानजनक रूप से भोजन करते देखने और जल्दी से जल्दी भोजन प्राप्त करने के लिए जमीन पर बैठे उत्सुक लोग जाति से कम और गरीबी से ज्यादा मजबूर होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मण व अन्य सवर्णों में जो गरीब होते हैं, वे भी सम्मानजनक रूप से भोजन करते हैं और उनमें श्रेष्ठता का गुरूर कुछ ज्यादा ही होता है। गरीब सवर्ण बहुत मुस्तैदी से अपनी जाति का अहसास कराता है। उसे लगता है, गरीबी के बावजूद जाति ही है, जो उसके श्रेष्ठता बोध को बचाती है और गरीब दलितों से ऊपर रखती है। नए दौर में जाति अमीरों की जरूरत नहीं रही, लेकिन यह सवर्ण गरीबों की जरूरत है।
मुझे खुशी है, मेरे गांव में जातिवाद का शिकंजा उस तरह से कड़ा नहीं है, जैसा कि हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में रहा है । पिछड़ी जातियों में भी कुछ लोगों ने खूब नाम कमाया है, जैसा भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर भी हमारे ही जिले के थे। वे जाति के नाई थे, उन्हें शुरुआती दिनों में अपमान भी खूब झेलना पड़ा, लेकिन अपने ज्ञान के दम पर उन्होंने पर्याप्त सम्मान अर्जित किया। भिखारी ठाकुर पर मेरे एक प्रिय लेखक संजीव सूत्रधार नाम से बेहतरीन उपन्यास लिख चुके हैं। भिखारी ठाकुर के जरिये बिहारी संस्कृति की श्रेष्ठता का साक्षात्कार हम करते हैं। बिहार में जाति व्यवस्था को जानने में भी सूत्रधार के जरिये काफी मदद मिलती है। बिहार की भूमि ने कला का सदैव सम्मान किया है, यह बात मैं अपने उत्तरी बिहार के बारे में दावे के साथ कह सकता हूं, क्योंकि इस इलाके को मैंने देखा है। नाच जैसी मुश्किल नाट्य शैली इसी क्षेत्र की देन है, जिसे भिखारी ठाकुर ने चरम सम्मान पर पहुंचाया था। नाच बड़े लोगों और पंडितों के बीच भी लोकप्रिय हुआ था, भिखारी ठाकुर पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बहुत विद्वान थे, उन्हें धर्म के बारे में भी कई ब्राहमणों से ज्यादा ज्ञान था। तो भिखारी ठाकुर के ज्ञान के सामने मत्था टेकने वालों की संख्या कम नहीं थी। कहने का मतलब यह कि कला और ज्ञान के आगे जाति की दीवार को ढहते देर नहीं लगती।








