(आदिपुरुष के बहाने दक्षिण और भक्ति)
भारत में सनातन की भौतिक बुनियाद भले उत्तर में मजबूत हो, पर धर्म का संचालन दक्षिण से ही होता आया है। आदि शंकराचार्य केरल से आए थे, रामानुजाचार्य तमिलनाडु से और रामानंदाचार्य जी का अवतरण भले ही प्रयागराज में हुआ, पर यह बार-बार दोहराया जाता है कि भक्ति द्राविड़ ऊपजी ल्याये रामानंद। अर्थात दक्षिण यात्रा से ही संत रामानंद को दुनिया ने रामानंदाचार्य के रूप में जाना। वही रामानंदाचार्य जी, जिनके शिष्यों में जुलाहा कबीर भी थे, रैदास चमार, धन्ना जाट, सैन नाई, पीपा क्षत्रिय और अनंतानन्दाचार्य ब्राह्मण थे।
यह भी तथ्य है कि विख्यात चित्रकार रवि वर्मा भी केरल के ही थे, जिन्होंने देव रूपों को अपने चित्रों के माध्यम से स्पष्ट किया।
दक्षिण का योगदान आज भी जारी है। मिसाल देखिए – साल 2015 में दक्षिण अर्थात केरल के एक युवा ग्राफिक डिजाइनर करन आचार्य ने खेल-खेल में काला और भगवा रंग मिलाकर एक उग्र हनुमान की रचना की थी। आज वह रचना भारत भर में अनेक वाहनों में पीछे शीशे पर शोभायमान है। बाद में उसी रंग-ढंग में युद्ध को तत्पर रामजी की भी फोटो आई और जगह-जगह सजाई-लगाई गई। सबसे उग्र तो जयश्रीराम की कर्कश ध्वनि वाला एक डीजे मिक्स ऑडियो जारी हुआ, शायद साल 2018 में, जो इन दिनों लगभग हर शोभा यात्रा में एक नाराज जयघोष या चीख की तरह शामिल रहता है और युद्ध में होने का एहसास कराता है।
अब उग्र हनुमान जी का चेहरा आदिपुरुष फिल्म के हनुमान जी से मिला लीजिए, बहुत साम्यता है। जब हनुमान उग्र हो जाएंगे, तो बाहुबली राम का अवतरण भी स्वाभाविक है, आदिपुरुष में हो चुका है। आदिपुरुष में राम बने अभिनेता प्रभाष अपनी आंखों में करुणा के आंसू तो ले आते हैं, लेकिन उनका आंगिक अभिनय बाहुबली वाला ही रह जाता है। राम के मुखमंडल पर जैसा सात्विक अभिनय या भाव होना चाहिए, वह हल्की स्याह दाढ़ी की भेंट चढ़ गया है। खैर, पिछली सदी के अरुण गोविल जी को नई सदी में खोजा जाएगा, तो कहां मिलेंगे? समय बदल गया है, उग्र हनुमान और आक्रामक राम के इस दौर में जैसी रामायण प्रेरित फिल्म बननी चाहिए थी, बन गई, स्वीकार कीजिए, क्योंकि परंपरा अनुसार, रामकथा में दोष नहीं देखा जाता है। कथा में दोष की स्थिति में मौन रहना ही श्रेष्ठ है।
वैसे आधुनिक दौर में जब तकनीक की प्रधानता होती जा रही है, तब मूल पौराणिक कथाओं के बार-बार प्रदर्शन को रोका नहीं जा सकता। अब पहले की तुलना में सिनेमा बनाना आसान हो गया है, तो बनाने वाले कमाई के मकसद से जरूर बनाएंगे। रोकने का यत्न समाज को करना चाहिए, वह कर भी सकता है, लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि क्या समाज में सबकुछ ठीक चल रहा है।
सुपर हाई पावर डीजे के साथ जब कथित धार्मिक शोभायात्राएं निकलती हैं, जब कांवड़ यात्राएं निकलती हैं, तो भक्ति भाव की कोमलता भला कहां खो जाती है? न भीड़ से भक्ति संभव है और न शोर से मोक्ष की प्रेरणा मिल सकती है। भीड़ शुद्धता को नष्ट कर देती है, जबकि शुद्धता ही धर्म का पवित्र आधार है। जहां शुद्धता नहीं, वहां धर्म कभी नहीं रह सकता। एक अशुद्ध या भ्रष्ट बुद्धि में ही हिंसा के विचार पनपते हैं। दूसरे को मूर्ख बनाने की कोशिश करना, दूसरे को किसी भी प्रकार से ठगने की चेष्टा करना कदापि धर्म नहीं है।
बड़े पर्दे पर ही नहीं, बल्कि छोटे पर्दे पर भी धर्म जैसे विषय को कृपया सिनेमा या कला उद्योग में भी वही लोग हाथ लगाएं, जो समर्पण भाव से ओतप्रोत हैं। कमाई के लिए दूसरे स्रोत हो सकते हैं, धर्म नहीं। धर्म को बेचने वाले किसी ढोंगी बाबा और धर्म के नाम पर फिल्म को बनाने-बेचने की कोशिश करने वाले समान रूप से निंदनीय हैं।
आदिपुरुष फिल्म में राम को खोजना कठिन नहीं है। जो लोग रामभाव वाले हैं, वो कहीं भी राम को खोज निकालेंगे। कवि लेखक मनोज मुंतशिर में भक्ति भाव की कमी है, लेकिन उन्होंने भी राम के चरण रज का स्पर्श करने का अपने ढंग से प्रयास किया है –
हो जनम जनम की खोज बताएं
राम से चल के राम पे आए
प्रेम कोई हम और न जानें
राम से रूठे राम से मानें
राम सिया की करुण कहानी
एक है चंदन एक है पानी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
राम सिया राम सिया राम जय जय राम…
संगीतकार-गायक सचेत परंपरा की आवाज में यह गीत सजीव बन गया है और बार-बार सुनने योग्य है। खासकर इस गीत को जब तमिल, तेलुगु और मलयालम में सुना जाए, तो एक अलग ही आनंद आता है। वैसे भी राम नाम को जितना सुना जाए कम है।
हिन्दी वालों को गर्व है, लेकिन वास्तव में आदिपुरुष का सर्वाधिक स्वागत तेलुगु में हुआ है। कमाई के आंकड़े अभी बहुत स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन इस फिल्म को फ्लॉप नहीं कहा जा सकता। बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो राम जी की सेना को थ्रीडी और वीएफएक्स में देखना चाहते थे। कोई आश्चर्य नहीं कि गूगल के हिसाब से अगर देखें, तो लगभग 48 प्रतिशत लोगों ने इस फिल्म को 5 स्टार प्रदान किया है। हां, मात्र एक सितारा देने वाले लोग भी 35 प्रतिशत से ज्यादा हैं।
आज जब नकारात्मकता का हाहाकार मचा है, तब जरूरी नहीं कि हर समझदार आदमी हमेशा निंदा पर उतर आए। कुछ मौकों पर और कुछ चीजों पर मौन रहना भी समझदारी ही है। खासकर धर्म से जुड़ी किसी भी चीज पर कूदकर निंदा प्रशंसनीय नहीं है। समाज में समझदार लोगों की यह परीक्षा है कि वे अपने संयम अपने धर्म को सशक्त रखें।
इस लोकतांत्रिक देश में पूजनीय पौराणिक कथाओं के फिल्मांकन को रोका नहीं जा सकता। अभी तो एक वानर सेना ने लोगों को चौंकाया है, जिस दिन शिव जी को हाथ लगाया जाएगा, जिस दिन थ्रीडी और वीएफएक्स में उनकी बारात निकलेगी, उस दिन पर्दे पर क्या अद्भुत नजारा होगा?
हां, यह समाज और उसके बड़े संगठनों का काम है कि वे यह सुनिश्चित करें कि ईश्वर को वही पवित्र व्यक्ति हाथ लगाए, जो वस्तुत: योग्य हो। वैसे ही भाव से भरा हो, जैसे रामानंद सागर भरे हुए थे। ध्यान रहे, रामानंद सागर आज संभव नहीं हैं, लेकिन अगर उन्हें संभव बनाना है, तो जिम्मेदारी हम सभी पर है, क्या हमने अपने समाज को सुरक्षित, संवेदनशील, भक्तिभाव पूर्ण और सेवाभावी बना लिया है? एक अच्छे समाज को ही अच्छा सिनेमा देखने का अधिकार है, वरना देखने को तो खूब नंगई बिखरी पड़ी है। सबसे पहले ज्ञान की लंगोट से सबको अपनी-अपनी नंगई छिपानी पड़ेगी। क्या हम तैयार हैं?








