एक प्यारे साथी को पाने की जंग

सिलवेस्टर स्टेलौन, विश्व प्रसिद्ध अभिनेता, फिल्मकार

बेशक, जिंदगी इम्तहान लेती है। नौबत ही ऐसी आ गई थी कि जिंदगी एक दड़बे में बसर करनी पड़ रही थी। कभी भोजन तलाशते-तलाशते रात हो जाती, तो कभी पेट समेटे इस उम्मीद में सोते कि चलो, सुबह कोई न कोई जुगाड़ हो ही जाएगा। हॉलीवुड में जगह बनाने के लिए जूझते उस नौजवान पर कई आफत बरस रही थीं। फिल्मों में छोटे-मोटे काम भी नसीब नहीं हो रहे थे। पत्नी के गहने बेच कुछ दिन गुजारा चला, फिर वही दाने-दाने को मोहताज। फाकाकशी ऐसी कि ढंग के जोड़ी भर कपड़े भी नहीं बचे थे, जूतों में दो छेद रुलाने लगे थे। मुसीबतों से लाचार जिंदगी में उस 26 वर्षीय नौजवान का साथी सिर्फ एक श्वान था, नाम था बटकस। छह साल का बुलडॉग। भूख से और स्याह लगती कुछ रातें ऐसी बीतीं कि बटकस का खुशनुमा चेहरा भी दुखी-पस्त लगने लगा। तब दिल पर पत्थर रख उसने एक फैसला लिया, और एक स्टोर के सामने अपने प्यारे डॉगी को बेचने के लिए जा खड़ा हुआ। उम्मीद थी, इतने प्यारे डॉगी को कोई अच्छा मालिक मिल जाएगा, तो कम से कम उसे भूख-तकलीफ से निजात मिल जाएगी। साथ ही, उसे बेचकर जो डॉलर मिलेंगे, उनसे कुछ दिन अपनी जिंदगी भी खिंच जाएगी। अनुमान था कि बटकस की कीमत कम से कम 100 डॉलर तो होगी ही। नौजवान को बेचना नहीं आता था, पहले ही इच्छुक ग्राहक के साथ सौदा निपटाने की जल्दी में लग गया और कीमत ठहरी महज 40 डॉलर। बटकस की रस्सी हाथ से जैसे ही छूटी, नौजवान की आंखों से आंसू बह चले। समझदार बटकस भी बहुत भारी कदमों से अपने पुराने मालिक को भाव-विभोर नजरों से निहारते हुए नए मालिक के साथ नई दिशा में बढ़ चला। नौजवान अपने डॉगी से ज्यादा देर तक नजरें न मिला सका, दिल से फफकता रहा।

उसके हाथों में गिनती के 40 डॉलर थे, लेकिन दिल में गम बेहिसाब था। बटकस ही तो था, जिससे अकेले में बात करके दिल हल्का हो जाता था। वह अपने प्यारे डॉगी को अक्सर दिलासा देता था कि ह्यबटकस, तू हिम्मत मत हारना, एक दिन हमारी किस्मत बदलेगी और हम फर्स्ट क्लास में ही सफर करेंगे।ह्ण जब पास कोई न होता, तो वह बटकस से ही अपने ख्वाब और किस्से साझा करता था। बुलडॉग नस्ल के उस श्वान के चौड़े चेहरे पर सुख-दुख के भाव बहुत स्पष्ट उभरते थे। वह बेजुबान अपने मालिक के भाव को बखूबी समझता था। जो मेल बन गया था, वह पीछे छूट गया, लेकिन क्या बटकस के साथ रहते देखे गए ख्वाब भी टूट जाएंगे? बटकस जाते-जाते कुछ कर गुजरने की ऐसी बेचैनी थमा गया कि न दिन को चैन था, न रात को आराम। भावनाओं से भरे ऐसे ही दिनों में उस नौजवान ने एक बेहतरीन फिल्म की पटकथा लिखी। जोश, जज्बा, जुनून से भरी वह पटकथा रॉकी  एक निर्माता को बहुत पसंद आई। फिल्म में नायक का किरदार निभाने का वादा लेने के बाद ही उस नौजवान सिलवेस्टर स्टेलौन को पटकथा के लिए 35,000 डॉलर मिले। एक तो मुख्य नायक होने का ख्वाब पूरा होने वाला था और जेब भी कुछ भारी हो गई थी। तब स्टेलौन को याद आया बटकस। वही बटकस, जो संघर्ष के दिनों का बहुमूल्य साथी था। रॉकी  फिल्म में ही नहीं, बल्कि स्टेलौन की जिंदगी में भी बटकस की बड़ी जरूरत थी।

अब बारी थी बटकस को फिर खोजने की। संघर्ष के दिनों के साथी के बिना कामयाबी का क्या मतलब? ठीक उसी जगह, उसी स्टोर के सामने तीन दिन खड़े रहना पड़ा, तब बटकस के दर्शन हुए। आंखें अनायास भर आईं। बटकस के नए मालिक से स्टेलौन ने भरे मन से कहा, ह्यअपने पैसे ले लो, मेरा प्यारा साथी मुझे लौटा दो।ह्ण नया मालिक तैयार न था। स्टेलौन ने समझाया, ह्यभाई, यह फिल्म लाइन का डॉगी है, इसकी बड़ी जरूरत है।ह्ण नया मालिक टस से मस नहीं हुआ। करीब छह महीने में समझदार बटकस ने उसका भी दिल जीत लिया था। अब शुरू हुआ मोलभाव, लेकिन स्टेलौन को न बेचना आता था और न खरीदना। बोली चढ़ती गई और आखिरकार 15,000 डॉलर पर नया मालिक पसीजा। अनमोल बटकस पर हाथ फिराकर स्टेलौन को लगा, मानो जिंदगी की एक बड़ी जंग में फतह हासिल हुई हो, दिल का एक भारी बोझ उतर गया हो। बटकस को अपने मालिक के साथ न केवल शानदार जिंदगी नसीब हुई, वह खुद भी एक चर्चित फिल्मी कलाकार बन गया। उसने रॉकी  और रॉकी-2  जैसी सफलतम फिल्मों में उम्दा काम किया। जिस टॉप क्लास में स्टेलौन सफर करते थे, उसी में बटकस भी साथ होता था। लगभग 12 साल की जिंदगी बिताकर 1981 में उसने अपने मालिक को अलविदा कह दिया। हॉलीवुड के सफलतम कलाकारों में गिने जाने वाले स्टेलौन कहते हैं, उनके कंप्यूटर स्क्रीन पर आज भी बटकस ही नुमाया है।

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