अंडभक्त बनाम लिब्रांडु विमर्श के समय

दुनिया में राजनीतिक इंफ्लुएंसर की संख्या बढ़ती जा रही है और इस मोर्चे पर भारत किसी भी दूसरे देश से आगे है। भारत जितनी ही आबादी वाले देश चीन में राजनीतिक इंफ्लुएंसर प्रजाति के सोशल मीडिया मुगल मुमकिन नहीं हैं। चीन पर विस्तार से बात करने की जरूरत है, लेकिन पहले भारत की बात।

भारत में अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत को 180 देशों के बीच 157वें स्थान पर रखा जाता है, ताकि यहां के लोकतंत्र को नीचा दिखाया जा सके। प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में पाकिस्तान और फलस्तीन भी भारत से बेहतर हैं। दुनिया का सबसे गरीब देश बुरंडी भी प्रेस स्वतंत्रता में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत से बहुत आगे है। दरअसल, ऐसी रेंकिंग का बहुत गड़बड़झाला है। ज्यादातर देशों की नजर में भारत आज भी एक पिछड़ा हुआ सामंतवादी देश है। ये देश मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारत में 284 अरबपति और लगभग 9 लाख करोड़पति परिवार हैं। भारत में पिछले वर्ष 2025 में 18,001 बीएमडब्लयू कारें बिकी हैं, लेकिन जब यहां ब्रिक्स का आयोजन हुआ। जब यहां शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन जैसे आला नेताओं का आगमन हुआ, तब ब्रिक्स के पोस्टर के साथ भारत में किसी साइकिल वाले, ऑटोवाले या पैदल यात्री को दिखाया गया। पश्चिम के देशों के मीडिया का मकसद ही यही था कि भारत को नीचा दिखाया जा सके। क्या अमेरिका में गरीब नहीं हैं, क्या चीन, फ्रांस, यूके में गरीब नहीं हैं? क्या इन देशों में साइकिल या ऑटो नहीं है? क्या इन देशों में लोग पैदल नहीं, हवाई जहाज से चलने लगे हैं? भारत के प्रति वैश्विक मीडिया का जो रवैया है, वह बहुत पुराना है और इसे जल्दी नहीं बदला जा सकता। अपनी फिल्मों में सत्यजित रॉय ने जो गरीब भारत दिखाया था, वही भारत पश्चिम देशों के लोगों के दिमाग में कमोबेश बसा हुआ है। गरीब भारत की छवियां पश्चिमी मीडिया में प्राथमिकता से छापी जाती हैं। भारतीयों की समझ में यह बात आनी चाहिए।

बहरहाल, भारत में सोशल मीडिया पूरी तरह से स्वतंत्र है। सोशल मीडिया पर कोई कुछ भी बोल सकता है, जब तक कि किसी दूसरे के अधिकारों का उल्लंघन न हो रहा हो। भारत में सोशल मीडिया पर गाली-गलौच की भी आजादी है और गाली-गलौच करने से सुनवाई भी होने लगी है।

अत्यधिक डिजिटल आजादी का नतीजा यह कि जरूरत से ज्यादा लोग अपना राजनीतिक ज्ञान परोसने लगे हैं। और तो और, लोग अपना मूल काम छोड़कर राजनीतिक ज्ञान बघारने में जुट गए हैं। ज्ञान बघारने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। भारत की राजनीति को प्रभावित करने के लिए कम से कम दस हजार राजनीतिक इंफ्लुएंसर सक्रिय हैं। इनमें से सौ से ज्यादा ऐसे इंफ्लुएंसर हैं, जिनकी सब्सक्राइबर संख्या लाखों में है।

ध्यान रहे, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया किंग हैं, लेकिन दूसरे स्थान पर एक इंफ्लुएंसर ध्रुव राठी को गिना जाता है। त्रासदी देखिए, यह नंबर टू सोशल मीडिया मुगल नंबर वन मीडिया किंग का घोर विरोधी है। यही नहीं, तीसरे स्थान पर गिने जाने वाले एक पूर्व टीवी पत्रकार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निंदा का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते हैं। रोहतक में जनमे ध्रुव जर्मनी में रहते हैं और वहीं एक जर्मन से विवाहित हैं। खतरनाक बात यह है कि वह अपनी नागरिकता पर चुप्पी साध लेते हैं और रहस्य गहराता है कि वह जर्मनी की नागरिकता स्वीकार कर चुके हैं।

भारत के टॉप टेन राजनीतिक इंफ्लुएंसर में से दो ही दक्षिणपंथ या राष्ट्रवादी विचारधारा के पैरोकार हैं। बाकी सब वाम या मध्य या कथित रूप से लिबरल हैं। अपमानित करने के लिए राष्ट्रवादियों को अंडभक्त कहा जाता है और लिबरल को लिब्रांडु। सौ राजनीतिक इंफ्लुएंसर को अगर देखें, तो उनमें से 25 भी ढंग से अंडभक्त श्रेणी के नहीं हैं। ज्यादा इंफ्लुएंसर लिब्रांडु हैं। होता यह है कि भारत में सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी का रोना रोने वाले ज्यादा हैं और उनके समर्थक कम। लिब्रांडु चूंकि संख्या में ज्यादा हैं, तो अक्सर अंडभक्तों की लिंचिंग सोशल मीडिया पर आम बात है। हालांकि, तानाशाही और बर्बरता के समर्थन का आरोप अंडभक्तों पर ही लगाया जाता है।

ये शब्द सुनने में बुरे लगते हैं, लेकिन क्या किया जाए? यही आज की भाषा है।

क्या हमें अपने देश का हित नहीं देखना चाहिए? क्या हमें अपने देश के बहुसंख्यकों का हित नहीं देखना चाहिए? क्या राष्ट्रवादी होना इतना बुरा है? क्या हिंदूवादी होना इतना बुरा है? अगर यहां हिंदूवादी होना गलत है, तो फिर हिंदुस्तान शब्द का क्या मतलब है? लिबरल जमात क्या हिंदुस्तान शब्द की कोई नई व्याख्या गढ़ रही है? हमें यह देखना होगा कि सोशल मीडिया पर हिंदुस्तान की आलोचना कहां तक सही है और कहां से हिंदुस्तान द्रोह शुरू हो जाता है। आलोचना हक है और द्रोह अपराध। यह स्वयं सोचने का विषय है और भारतीय संविधान यह अधिकार देता है कि हम स्वयं अपने देश का हित देखें। विरोध का अर्थ यह नहीं कि हमें विरोध की बीमारी हो जाए।

कोई शक नहीं, हिंदुस्तान और यहां की सरकार की आलोचना का एक अपना बड़ा बाजार है। सरकार के सबसे बड़े आलोचक ध्रुव राठी की मासिक कमाई 60 लाख रुपये से ज्यादा है। सरकार का कोई प्रशंसक दक्षिणपंथी इंफ्लुएंसर न इतना कमाता है और न सरकार किसी को इतने पैसे देती है। आलोचना करते-करते विकास योजनाओं तक की आलोचना कर चुके पूर्व टीवी पत्रकार की मासिक कमाई हर हाल 30 लाख रुपये से ज्यादा बताई जाती है। कोई सरकार समर्थक या राष्ट्रवादी इंफ्लुएंसर इतनी कमाई भी नहीं कर पाता है और न इतने पैसे उन्हें सरकार देती है।

हां, भारत में इंफ्लुएंसर को पिछले दरवाजे से पैसे मिलने लगे हैं। राजनीतिक दल भी ऐसा कर रहे हैं, लेकिन इसका कोई तय पैमाना नहीं है। यहां हम अमेरिका से सीख सकते हैं और यहां भी इंफ्लुएंसर की पार्टी स्पष्ट होनी चाहिए। किसी राजनीतिक दल के पक्ष में कंटेंट बनाना पत्रकारिता नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया में ऐसा होना एक व्यवसाय है। यह व्यवसाय कतई पत्रकारिता नहीं है। सोशल मीडिया का ज्यादातर हिस्सा पत्रकारिता के पैमानों को बहुत पीछे छोड़ आया है। अमेरिका में सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले 21 प्रतिशत से ज्यादा लोग सूचनाओं के लिए इंफ्लुएंसर पर निर्भर रहने लगे हैं। भारत में यह प्रतिशत कुछ ज्यादा ही होगा। लोग भले दैनिक समाचार पत्र न पलटते हों, लेकिन इंफ्लुएंसर की बात जरूर सुनते हैं और सबकी अपनी-अपनी पसंद का हक है।

अंत में यह कि अंडभक्त और लिब्रांडु विमर्श समय के साथ तल्ख होता जा रहा है। दोनों ही तरफ बेचैनी बढ़ रही है, तो भाषा भी खराब होती जा रही है। कंटेंट में गालियों का समावेश सामान्य होता जा रहा है।

वक्त आ गया है कि संतुलन बनाए रखा जाए। अपने प्रति ईमानदार होने के साथ ही, सबसे जरूरी है, हिंदुस्तान के प्रति ईमानदार होना। इंफ्लुएंसर अपने फायदे या मजे के लिए कुछ भी बोल सकते हैं। अत: दर्शकों या श्रोताओं को ही सजगता से काम लेना होगा। कुछ सुनकर तत्काल प्रभावित होने से बचना चाहिए। तत्काल फैसला ले लेना या सुना देना मूर्खता ही है। बुद्धि-विवेक को किसी इंफ्लुएंसर के पास गिरवी रखने की जरूरत नहीं है। ये इंफ्लुएंसर आपको खरीद लेना चाहते हैं, आप तय कीजिए कि आपको बिकना नहीं है, किसी से नहीं और कभी नहीं।

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