सीजेपी आंदोलन से हासिल 11 सबक

25 जुलाई की दोपहर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक बड़ी सांकेतिक सफलता है। हालांकि, इस सांकेतिक सफलता तक पहुंचने के क्रम में बहुत कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी चर्चा जरूर होनी चाहिए। इस आंदोलन से उपजी कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर ईमानदारी से सोचने की जरूरत है। हम किसी भी सुधार को केवल इसलिए मकाम तक नहीं पहुंचा पाते हैं, क्योंकि एक इस्तीफे या एक सफलता के बाद अपने लक्ष्य को भूल जाते हैं। अपने छोटे स्वार्थ में भटक जाते हैं।

पहली बात – युवाओं की नाराजगी का आभास सरकार को 20 जुलाई के बाद हुआ है। शायद सरकार सीजेपी की ताकत देखना चाहती थी। इसमें कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन सोचना चाहिए कि इस्तीफा जल्दी न देने से क्या हासिल हुआ?

दूसरी बात -सरकार ने ही नहीं, सीजेपी के आंदोलन को विपक्षी दलों ने भी पहले हल्के में लिया था। जब युवा जुटने लगे, तब विपक्षी दल भी सक्रिय हुए। विदेश से लंबा दौरा कर लौटे नेता प्रतिपक्ष को पहले ही हालात का जायजा लेना चाहिए था।

तीसरी बात – भाजपा बेशक झुकी है, पर उसके विरोधी दलों को भी अपने कृत्य या फैसलों से यह आभास कराना चाहिए कि वह पेपर लीक को लेकर सचमुच गंभीर हैं। जिन राज्यों में लीक की घटना होगी, वहां शिक्षा मंत्री का इस्तीफा होना चाहिए।

चौथी बात – सबसे पहले पुलिस को अपना विचार-व्यवहार सुधारना चाहिए। यह ऐसा विभाग है, जिसमें गालियों का सर्वाधिक प्रयोग होता है। जब सामने पुलिस थी, तो छात्रों और आंदोलनकारियों ने भी स्वाभाविक ही गालियों का खूब प्रयोग किया है।

पांचवीं बात – पुलिस के आम नागरिक संबंधी अधिकारों में कटौती होनी चाहिए। अपराधियों पर ताकत का इस्तेमाल समझ में आता है, पर एक लोकतंत्र में आम लोगों या छात्रों पर पुलिस को लाठी चलाने या गोली मारने का हक कतई नहीं होना चाहिए।

छठी बात – सबको एक लाठी से हांकना ठीक नहीं है। मिसाल के लिए, सोनम वांगचुक स्थापित हस्ती हैं, उनकी नाराजगी या उनके प्रति नाराजगी को सही रूप में रखने की जरूरत है। कानून सम्मत शालीन व्यवहार बढ़ाने की जरूरत है।

सातवीं बात – भारत में शिक्षा से जुड़े तमाम दफ्तरों के कामकाज विस्तार से परखना चाहिए। हमारे शिक्षा विभाग शर्मनाक स्थिति में हैं। यहां लालची, कामचोर, अयोग्य लोगों की भरमार है। देश को शिक्षाकर्मी नहीं, शिक्षा सेनानी की जरूरत है।

आठवीं बात – न्यायपालिका को भी अपनी धुन में रहना छोड़कर, देश की सच्ची सेवा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लोकतंत्र के इसी स्तंभ ने कॉकरोच जैसा शब्द दिया है। इस स्तंभ को गिरेबां में झांककर देखना होगा कि कहां-कितने कॉकरोच हैं।

नौवीं बात – विधायिका को शिक्षा में सुधारों के प्रति सचेत होना चाहिए। बच्चों को विदेश पढ़ने भेजना आसान है, पर अपने देश में शिक्षा सुधार कठिन क्यों है? विधायिका को शर्म आनी चाहिए कि उसे जगाने के लिए ऐसे आंदोलन की जरूरत पड़ी है।

दसवीं बात – मीडिया के मठाधीशों को संतुलन बनाना होगा और सोचना होगा कि उसको इतने अपशब्द क्यों बोले जा रहे हैं।मीडिया को पड़ रही गालियां, दरअसल उन लोगों के लिए हैं, जो मीडिया को सच्ची पत्रकारिता से दूर ले जाना चाहते हैं।

ग्यारहवीं बात – युवाओं से ज्यादा जुड़ने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात को सबसे पहले समझ लिया है और वह सोशल मंचों के जरिये सक्रिय हो गए हैं। आज देश में एक दूसरे की नाराजगी दूर करना सबसे जरूरी है।

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