भारत कैसे और क्यों आए दलाई लामा

तेनजिन ग्यात्सो

जन्मदिन – 6 जुलाई

14वें दलाई लामा

जब जड़ें किसी जमीन से उखड़कर चोटिल होती हैं, तो शायद फिर कभी ठीक नहीं हो पाती हैं। इंसान के साथ भी ऐसा ही है, जन्मभूमि छूट जाए, तो दिल में लगी चोट ताउम्र दुखती है। जन्मभूमि तो नहीं छूटी थी, पर उन लामा को दुख इतना था कि नींद नहीं आती थी। सुंदर तिब्बत के सुंदरतम ल्हासा के अति-सुंदर स्वप्न सरीखे विशाल महल में लामा अक्सर बेचैन टहलते थे। कम ही उम्र में लामा की पदवी मिली थी, तिब्बती लोग भगवान से कम नहीं मानते थे, पलकों पर सजाए रखते थे। चिंता होती थी कि लामा की राह में कांटे बिछाए जा रहे हैं।

ड्रैगन की सेना तिब्बत में घुस आई थी। पहले तो यही समझौता हुआ था कि तिब्बत की संस्कृति व स्वायत्तता की रक्षा की जाएगी, पर जल्द ही ड्रैगन ने रंग दिखाना शुरू किया। एक दिन उसके लाल सिपाहियों ने लामा को बुलावा भेजा। हिदायत थी, कथित कार्यक्रम में ड्रैगन के सुरक्षा गार्ड ही साथ चलेंगे। लामा तिब्बत के आध्यात्मिक राजा थे और उनके साथ 20 हजार अंगरक्षक रहा करते थे। जब पता चला कि लामा अकेले बुलाए गए हैं, तो चिंता की लहर दौड़ गई। लामा के महल को हजारों तिब्बतियों ने घेर लिया कि लामा आप ड्रैगन के झांसे में नहीं आएंगे। ड्रैगन जिसे ले जाता है, लौटाता नहीं है।

लामा की उम्र महज 23 वर्ष थी, पर वह जानते थे कि ड्रैगन के आमंत्रण को ठुकराने का मतलब क्या होता है। खैर, प्रजा की मर्जी चली, लामा ने बुलावे पर चुप्पी साध ली। पूरे तिब्बत को पता था कि ड्रैगन दिन-रात साजिशें रच रहा है कि कैसे लामा को महल से बाहर लाया जाए। महल में लामा और बाहर करीब बीस हजार अंगरक्षक जागा करते थे कि कोई अनहोनी न हो जाए।

खैर, देखते-देखते वह काली रात आई, जब ड्रैगन ने अपनी तोपों का मुंह महल की ओर किया और दो गोले महल के बगीचों में आ गिरे। कोहराम मच गया, पर लामा ने संदेश दिया कि शांत रहना है। हिंसा से हर हाल में बचना है। ल्हासा की सुंदर वादियों में खूनखराबा कतई नहीं होना चाहिए। चिंता यह थी कि तोपें अगर गरजेंगी, तो ल्हासा हमेशा के लिए उजड़ जाएगा, पर ल्हासा में रुकने का मतलब है, हिंसा और युद्ध को न्योता। अगर महल के मोह में अपने लोग मारे गए, तो फिर लामा होने का क्या मतलब रह जाएगा? लोगों को हर हाल में बचाना होगा। लोग बचेंगे, तो ही संस्कृति बचेगी। संस्कृति को बचाने के लिए पहले स्वयं को बचाना होगा। ऐसे में, बेहतर होगा कि महल छोड़ दिया जाए। हो सके, तो तिब्बत ही छोड़ दिया जाए और चला जाए अपने बुद्ध के देश भारत, जो सदियों से दुनिया के दीन-दुखियों की शरणगाह है। फैसला बहुत मुश्किल था, मगर दिल पर पत्थर रख लामा ने अपने कंधे पर एक बंदूक रखी और खिड़की से बाहर कूद चले। अंधेेरे और बर्फीले पहाड़ों में चलते रहे। ल्हासा का स्नेहिल कुहासा रह-रहकर राह रोक रहा था कि न जाओ लामा अपनी धरती छोड़कर, पर लामा भारी मन और तेज कदमों से बढ़े जा रहे थे। एक वह भी युग था, जब राजकुमार सिद्धार्थ ऐसे ही अपने महल से चुपचाप चले थे, बुद्ध होने के मार्ग पर।

राह में लामा कहीं बहुत थक गए, तभी रुके और कुछ ही देर विश्राम के बाद फिर चल पड़े। ड्रैगन के सिपाहियों के शिकंजे से जल्द से जल्द और दूर निकल जाना था। वह जहां भी रुकते थे, तिब्बती लोग आंसुओं से उनके चरण पखारते थे कि हमारे राजा जा रहे हैं, तो हमें भी देर-सबेर पीछे चलना ही होगा। अब जो पीछे रह जाएगा, वह हमेशा के लिए बदल जाएगा।

पूरे 13 दिन बाद तिब्बत की सीमा समापन पर आई थी, आगे स्वतंत्र भारत का अरुणाचल दिखने लगा था। 30 मार्च, 1959 का दिन था। लामा एक बार फिर ठिठके थे, अब यहां से अपना देश पीछे छूट जाएगा, पर पीछे छूटे हुए लोग सुरक्षित रह जाएंगे! लामा ने अपनी मातृभूमि का अंतिम स्पर्श किया था, उसकी मुक्ति का संकल्प उनकी आंखों में उमड़ आया था।

खैर, लामा और धीरे-धीरे विशाल हो चुका उनका दल 31 मार्च को खेंजीमाने दर्रे से चलते हुए भारत की सीमा में आ गया था, पर यहां भी ड्रैगन का खतरा था, तो सभी दो दिन और चलते रहे और आखिर भारत की सुरक्षित गोद तवांग पहुंच गए। तब पूरी दुनिया ने जाना कि तिब्बत के धर्मगुरु लामा अर्थात 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो भारत पहुंच गए हैं।

तब से वह भारत से ही दुनिया को प्रेम, सेवा, शांति, अहिंसा, मानवीयता का संदेश दे रहे हैं। आज उनका सम्मान पूरी दुनिया करती है। उन पर सभी को गर्व है। वर्षों बाद साल 2017 में वह तवांग यात्रा पर गए थे और पुराने दिनों को याद कर भावुक होते हुए कहा था, ‘मैं एक ऐसी जगह को फिर देख रहा हूं, जहां मैंने पहली बार आजादी का आनंद लिया था।’

(हिन्दुस्तान में प्रकाशित अपने कॉलम से)

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