यह गुलमोहर शर्मिला नहीं है

भाग – एक
गुलमोहर फिल्म कुछ दिन पहले ही देख लिया था। चकित था, बहुत दिनों बाद एक ऐसी आधुनिक, पारिवारिक और मनोरंजक फिल्म आई है। फिर एक दिन सुबह प्रिय माननीय वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण जी का एक संदेश आया, ‘देखिए, गुलमोहर, मैंने भी एक छोटा सा काम किया है, पार्क में शर्मिला जी टहलने जाती हैं और वहां मेरी उनसे संक्षिप्त मुलाकात होती है’। विनीत जी ने वह वीडियो क्लिप भी भेजी, देखकर बहुत अच्छा लगा। यह अच्छा तरीका है, ज्यादा से ज्यादा लोगों को परस्पर जोड़कर फिल्म का गुलदस्ता तैयार करना। वैसे इस फिल्म में उम्दा गजल गायक तलत अजीज ने भी एक किरदार में बेहतरीन काम किया है, ओटीटी पर उनका भविष्य भी उज्ज्वल हो सकता है।

खैर, बात अब तफसील से। गुलमोहर गर्मियों में खिलता है। यह गुलमोहर फिल्म उससे कुछ पहले ही चल निकली है, तो गर्मियों तक चर्चा तय है। वैसे गुलमोहर इस फिल्म में एक बंगले का नाम है, जो बिक रहा है, जहां बत्रा परिवार 34 साल रहा है, जो अब टूट रहा है। सुखांत फिल्म है, तो अंत में परिवार टूटने से रह जाता है और शायद बंगला बिकने से।
कुल मिलाकर, यह फिल्म अच्छे अभिनेताओं का गुलदस्ता है, विशेष रूप से शर्मिला टैगोर, मनोज वाजपेयी और अमोल पालेकर की त्रयी जब भी इस फिल्म में स्क्रीन पर दिखती है, तो छा जाती है।

एक दृश्य है, जहां अरुण प्रभाकर बत्रा (मनोज वाजपेयी) वसीयत पढ़ रहे हैं, कांपती उंगलियों में थर्राते कागज और कुछ आंसू से भर-भर आती आवाज। चेहरे की नसों का तनाव। कागज पर गड़ी नजरें। मानो उठ गईं, तो भावनाओं के बांध टूट जाएंगे। और ठीक इसी समय कुसुम बत्रा (शर्मिला टैगौर) का एक हवा में ठहरा हुआ हाथ कि रुक जाओ, अरुण, मत पढ़ो। आंखों पर दुख भरी बेचैनी। और ठीक इसी समय सुधाकर बत्रा (अमोल पालेकर) के चेहरे पर सुकून का भाव, खिलता हुआ। शर्मिला और अमोल इस देश के बेहतरीन अभिनेता हैं।

दोनों 78 के हो गए हैं। अमोल 14 दिन बड़े हैं। दोनों के चेहरे की उर्वरा और चमक कहीं भी कम नहीं पड़ी है। शर्मिला की संक्रामक मुस्कराहट इस फिल्म में बार-बार याद दिलाती है कि यही कभी सपनों की रानी थीं। अमोल आज भी एहसास करा देते हैं कि वह पड़ोस के वही सीधे-सादे चित्तचोर हैं। फिल्म फर्जी के बाद अमोल की यह ओटीटी पर बेहतरीन प्रस्तुति है। उन्हें ओटीटी को ज्यादा समय देना चाहिए, इससे ओटीटी की दुनिया ज्यादा संपन्न हो सकेगी। शर्मिला टैगोर तो एक पूंजी हैं, जिन्हें जितना खर्च किया जाए, कम है।

किरदार में उतर जाने की कला अमोल पालेकर बखूबी जानते हैं और उन्हें पता है कि कब सांस लेना है और कब नजरों को असंतुष्ट या शिकायती दिखाना है। शर्मिला टैगोर और अमोल पालेकर, दोनों ही स्वाभाविक अभिनेता हैं। एक समय बीच में रहा, जब दोनों का उपयोग नहीं हो रहा था, लेकिन गुलमोहर ने सुनिश्चित कर दिया है, अब दोनों का भरपूर उपयोग होने वाला है।

गुलमोहर में शर्मिला के किरदार के अनेक रंग हैं। वह पति को जमशेदपुर से दिल्ली लाती हैं, अपने हिसाब से जीती हैं, लेकिन पति की गलत वसीयत पर बिना सवाल दस्तखत भी कर देती हैं। यह विडंबना है। वह समलैंगिकता को बुरा नहीं मानतीं और उनकी इच्छा पुड्डूचेरी चले जाने की है, जहां उनकी वह सहेली भी रहने लगी हैं, जो कॉलेज के दिनों में पीछे छूट गई थीं। फिल्म के अंत में जब सहेली के पुड्डूचेरी में होने की सूचना आती है, तब वह अपनी समलैंगिक पोती को बहुत प्यार से आंख मारती हैं। गुलमोहर को चटक खिलाने की यह कोशिश तो कामयाब होगी ही, शर्मिला टैगोर ने नए दौर को यह संदेश भी दे दिया है कि शर्मिला न पहले शर्माती थी और न अब शर्माएगी। तुम्हें शर्म आती हो, तो भले शर्मा लो, फर्क नहीं पड़ता।

क्रमश:

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