अभ्यास
हर लिखने वाले को अभ्यास जरूर करना चाहिए। अभ्यास से ही लेखनी में धार पैदा होती है। जैसे तैरने के अभ्यास के बिना आदमी नदी में डूब सकता है, ठीक वैसे ही अभ्यास के अभाव में लेखक लिखते हुए पिट सकता है। अभ्यास का मतलब यह नहीं, गलत अभ्यास किए जा रहे हैं और अच्छे की समझ ही नहीं है। अच्छे को समझना चाहिए और अच्छे का ही अभ्यास करना चाहिए।
यहां अभ्यास के दो अर्थ हैं। अभ्यास का पहला अर्थ बार-बार अच्छा लिखने का प्रयास करना है। नए लेखकों या लेखक बनने की इच्छा रखने वालों को अच्छा लिखने का सतत अभ्यास करना चाहिए, अभ्यास से ही अच्छा लिखने का कौशल आता है, लेखन सुधरता जाता है। अभ्यास का दूसरा अर्थ एक ही बात, समाचार या लेख को फिर लिखने या सुधारने से है। कई अच्छी रचनाएं एक ही बार में या वन स्ट्रोक में नहीं लिखी जाती हैं, उनके कई ड्राफ्ट तैयार करने पड़ते हैं। जरूरी नहीं है कि एक बार लिखने से ही बढ़िया लेख या फीचर तैयार हो जाए, उसे माकूल रूप मिल जाए। हो सकता है, उसे बार-बार लिखने की जरूरत पड़े। ऐसे में मेहनत से नहीं बचना चाहिए। अच्छी कहानियां कई-कई ड्राफ्टों के बाद फाइनल होती हैं। खासकर कवि तो बार-बार लिखते हुए ही कविता को साधते और गढ़ते हैं।
हिन्दी में यह देखा जाता है, लेखक लिखने के बाद अपने लिखे हुए को खुद पढ़ना पसंद नहीं करता। ऐसे लेखकों का ज्यादातर लेखन बहुत बुरा होता है, वे त्रुटियां छोड़ते चलते हैं और लेखन कार्य के साथ अन्याय करते हैं। अतः अभ्यास के बिना न तो अच्छी तलवारबाजी आ सकती है और न अच्छी शब्दबाजी या कलमबाजी।








