काॅकरोच जनता पार्टी की लोकप्रियता के पीछे भाजपा की बढ़ती अलोकप्रियता का भी कुछ हाथ है, पर भाजपा की शक्ति को कम करके नहीं देख सकते। सत्ता में किसी पार्टी की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, उसके विरोधियों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ती है।
लोग जंतर-मंतर पर भीड़ देखकर चिंतित हैं। यह सोचने लगे हैं कि भाजपा की अलोकप्रियता बढ़ रही है, पर यह समझने की जरूरत है कि अभी साल 2029 में काफी समय है और भाजपा को चुनाव जीतना दूसरों से बेहतर आता है। गौर करने की बात है कि भारत में 62 प्रतिशत से ज्यादा लोग भाजपा को वोट नहीं देते हैं। सौ में से केवल 37 वोट ही भाजपा ले पाती है, मतलब, हर दस में कम से कम छह या सात लोग भाजपा के विरोधी हैं। भाजपा ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन वह विरोधियों की संख्या को कम नहीं रख पा रही है। यह भाजपा के लिए सोचने वाली बात है और वह निश्चित ही सोच रही होगी।
उसे यह बात ध्यान में जरूर रखना चाहिए कि कोई भी सरकार आम तौर पर अलोकप्रिय क्यों होती है? इसके तीन प्रमुख कारण हैं। पहला कारण है, सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद स्वाभाविक ही अहंकार उपजता है। नेता भी आखिर इंसान ही होते हैं, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें दिन-रात आका होने का आभास कराते हैं, तो अहंकार से बचना बहुत कठिन हो जाता है। दूसरा कारण, भ्रष्टाचार है। अहंकार से भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। अहंकार असंभव को संभव करने की कोशिश करता है, इस सिलसिले में अनेक बार मर्यादाएं भी खंडित होती हैं। यहां यह ध्यान देने की बात है कि जो लोग नेताओं को अहंकारी बनाते हैं, वही लोग उन्हें भ्रष्टाचारी भी बनाते हैं। अब देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है या घटा है, यह स्वयं में विचार-अध्ययन का विषय है? समानता बढ़ी है या असमानता बढ़ी है, यह भी स्वयं विचार का विषय है? तीसरा कारण, वंशवाद है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय होते, तो इसका कोई इलाज बताते। पता नहीं क्यों, वंशवाद का विरोध करने वाले ज्यादातर बड़े नेता बाद में अपनी सत्ता अपने परिजन को हस्तांतरित करना चाहते हैं।
सत्ता का अपना स्वभाव है और यहां सज्जन से सज्जन व्यक्ति भी अपना पूरी तरह बचाव नहीं कर पाता है। कई बार नेता बहुत ईमानदार होते हैं, लेकिन उनके निकट के लोग उन्हें पूरे अधिकार भाव से अनियमितता के लिए मजबूर करते हैं। एक अन्य कारण भी है, सत्ता भोगने की एक सीमा होती है। व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से भोग पाता है। क्या भाजपा में आगे शासन करते रहने की इच्छा कम हो रही है? क्या वर्तमान समस्याओं को सुलझाने की तमन्ना घट रही है? क्या राम मंदिर का महाप्रसाद वैराग्य जगाने लगा है? क्या अब सड़कों पर उतरने में कमल के फूल मुरझाने लगे हैं?
यहां यह ध्यान रखने की बात है कि जिस पार्टी में सेवा करने की रफ्तार दूसरी पार्टिंयों से ज्यादा होती है, वही पार्टी सत्ता की हकदार बनती है। क्या फिलहाल कांग्रेस द्वारा की जा रही जन सेवा रफ्तार पकड़ने लगी है? क्या कांग्रेस पूरी मेहनत कर रही है? अभी कांग्रेस केवल 21 प्रतिशत वोट ही बटोर पा रही है। वह भाजपा से लगभग 16 प्रतिशत नीचे है, लेकिन वह अगर 6 प्रतिशत वोट भी ज्यादा पा जाए, तो गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आ जाएगी।
यहां भाजपा को सचेत हो जाना चाहिए। लोगों को यह आभास नहीं होने देना चाहिए कि सत्ता में रहते भाजपा का मन भर गया है। जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ कतई चिंता की वजह नहीं है, लेकिन वह एक संकेत जरूर है। दौर कोई भी हो, सवालों के मुंह को जवाबों से ही बंद किया जाता है। लोकतंत्र में जिस पार्टी के पास समकालीन सवालों का मुंहतोड़ जवाब होता है, वहीं धीरे-धीरे हावी होने लगती है। आपके पास बोलने के लिए कुछ नया और उपयोगी हो, तभी लोग आपको सुनते हैं।
भाजपा के लिए अच्छी बात है कि विपक्ष के पास अभी कुछ भी नया या उपयोगी नहीं है। परीक्षा सुधार के लिए जो आंदोलन विपक्षी दलों को करना चाहिए था, उसके लिए कॉकरोच जनता पार्टी जैसे एक अलग मंच को सामने आना पड़ा। कॉकरोच जनता पार्टी ने भाजपा काे अगर नुकसान पहुंचाया है, तो विपक्ष को भी परेशान किया है।
भाजपा को याद करना चाहिए। वह जब सत्ता में आई थी, तब उसके शुरुआती सफलतम अभियानों में स्वच्छता के लिए किया गया आंदोलन सबसे श्रेष्ठ था। एक ऐसा आंदोलन जिसमें गांधी जी के चश्मे का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ था। दरअसल, आज एक आंतरिक स्वच्छता अभियान की जरूरत आन पड़ी है। ये कॉकरोच व्यवस्था में आई आंतरिक गंदगियों की ही उपज हैं, ये तभी जाएंगे, जब गंदगी का अंत हो जाएगा। स्वच्छ भारत अभियान में अभी बहुत कार्य शेष हैं।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यह नाराजगी का कॉकरोच है। आप एक-एक कर नाराजगी दूर करते जाइए, ये कॉकरोच धीरे-धीरे गायब होते जाएंगे। अभी समय है, चुनाव दूर है।








