भाग – 2
नाट्यशास्त्र को क्यों भूल गए?
शायद हमने आजादी मिलते ही यह तय कर लिया था कि हम ऋषि-मुनियों के लिखे शास्त्रों को कहीं नहीं पढ़ाएंगे। हमने यह मान लिया कि हमारे शास्त्रों में जो भी लिखा है, वह दकियानूसी है, हमारे काम का नहीं है। अपने शास्त्र से सैद्धांतिक और व्यावहारिक दूरी बनाने की कोशिश में हमने बहुत हद तक अपने शास्त्रों को अंधेरे तहखानों में बंद कर दिया। केवल संस्कृत पढ़ने-जानने वाले विद्वानों के बीच ही भरतमुनि का नाट्यशास्त्र बहुत छोटे स्वरूप में जीवित रहा।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
यह आश्चर्य की बात है कि भारत के श्रेष्ठतम अभिनय प्रशिक्षण संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा अर्थात राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बहुत लंबे समय तक भरतमुनि पाठ्यक्रम में शामिल नहीं थे, शायद आज भी उन्हें ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता है। मुझे याद है, साल 2012 में जयपुर में ‘संस्कृत और उसका पड़ोस’ नामक विचारोत्तेजक सेमिनार में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढ़कर निकलीं विद्वान ड्रामा प्रोफेसर जब अभिनय पर बोल रही थीं, तब मैंने एक कागज पर लिखकर उनके पास भिजवाया था, ‘कृपया, भरतमुनि पर भी कुछ बोलिए।’ सौभाग्य, जब उसके बाद उन्होंने भरतमुनि पर बोलना शुरू किया, तब उनमें जागा उत्साह मुझे आज भी याद है। उन्होंने कहा था कि भारतीयों को मालूम नहीं है कि उनके पास क्या-क्या विद्याएं आदिकाल से उपलब्ध हैं। भारत के पास अपनी जो विद्याएं हैं, उनकी कोई तुलना नहीं है, लेकिन जरूरी है कि हम उन्हें याद रखें, रस और भाव को समझें, विकसित करें, आम लोगों तक ले जाएं। उस अभिनय को समृद्ध करें, जो शायद हर कोई करता है, कभी कम, कभी ज्यादा।
बहरहाल, यहां प्रश्न है कि जब भरतमुनि भुला दिए गए थे, तब नाट्य का अध्ययन कैसे हो रहा था? नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एक निश्चित फॉरमेट में कुछ योग्य युवाओं को ड्रामा पेश करना सिखाया जाता है। ड्रामा करने के तरीके बताए जाते हैं, तरह-तरह के व्यायाम व अभ्यास कराए जाते हैं, ताकि यहां पढ़ने वालों को नाटक पेश करने लायक विद्या हासिल हो जाए। यहां पढ़ाई ऐसे होती है कि ज्यादातर ड्रामा प्रशिक्षित युवा मंच के पीछे ही छूट जाते हैं। कुछ ही युवा ड्रामा क्षेत्र में मंच पर पांव जमा पाते हैं, उनमें से भी कुछ ही युवा नाम कमा पाते हैं। नाम कमाने वालों से भी जरा पूछकर देखिए कि उन्हें ड्रामा सीखने के बाद भी अभिनय या सिनेमा के संसार में काम पाने के लिए कितना संघर्ष किया है?
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से निकले अब तक के सबसे सफलतम और सम्मानित छात्र नसीरुद्दीन शाह हैं। उनका लोहा सभी मानते हैं, पर मुख्यधारा फिल्म उद्योग के पास उनके लिए भी बहुत काम नहीं हैं। वह भारतीय सिनेमा की दुनिया में किन्हीं खास अर्थों में ही स्टार कहे जा सकते हैं। वैसे, जो लोग स्टार व सुपर स्टार हैं, उनके प्रति नसीर साहब का असंतोष जगजाहिर है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा भारतीय सिनेमा को एक आधार तो देता है, पर उसके बिना भी भारतीय सिनेमा का काम चल सकता है। जितने अभिनेता यह स्कूल दे रहा है, उससे कई गुना ज्यादा अभिनेता बगैर किसी ड्रामा स्कूल के फिल्म उद्योग में आ रहे हैं।
क्या ज्यादा कामयाब नहीं हो पाया नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा?
यहां हमें कुछ इतिहास में जाकर यह जान लेना चाहिए कि रूस में एक महान अभिनय गुरु हुए कॉन्स्टेंटाइन स्टैनिस्लावस्की (1863-1938), जिनका डंका पिछली सदी के शुरुआती दशकों में दुनिया भर में खूब बजा। उन्होंने अभिनेताओं को यह बताया कि अपने अनुभवों में उतरकर अभिनय कीजिए। मिसाल के लिए, अगर आपको किसी दृश्य में अपनी प्रेमिका की याद में रोना है, तो आप याद कीजिए कि आप सचमुच अपनी प्रेमिका की याद में कब-कैसे रोए थे। जब आप अपने अनुभव के आधार पर रोएंगे, तब आप अपने दृश्य में स्वाभाविक रोते दिखेंगे। मतलब, अभिनय का रसायन कहीं बाहर से लेने के बजाय अपने अनुभवों से ही पैदा किए जाएं।
दोराय नहीं कि लावस्की अभिनय का व्याकरण खोजने का दावा करते थे और अभिनय विधा को निरंतर विकसित कर रहे थे। उनके अभिनय ज्ञान का डंका खूब बजा। उनसे ही सीखकर ली स्ट्रैसबर्ग अमेरिका के प्रसिद्ध अभिनय गुरु कहलाए। स्ट्रैसबर्ग ने लावस्की की खोज को ही बार-बार दोहराया और मैथड एक्टिंग को अभिनय के बाजार में पुरजोर स्थापित किया। मैथड एक्टिंग अर्थात पद्धतिबद्ध अभिनय, अर्थात अभिनेता के अपने अनुभवों या स्मृति पर आधारित ऐसा अभिनय, जो अभिनय न लगे, पूरी तरह से स्वाभाविक लगे।
यह बहुत दिलचस्प है कि लावस्की से ही प्रभावित होकर एक प्रसिद्ध अभिनेत्री व अभिनय की गुरु-मां स्टेला एडलर ने सिखाना शुरू किया। पहले वह स्ट्रैसबर्ग के ही साथ थीं, पर जल्दी ही उन्होंने अपनी अलग राह पकड़ने शुरू की। ध्यान रहे, तब तक सिनेमा के महाकेंद्र अमेरिका में ही लावस्की को अनेक कुशल अभिनेताओं की ओर से चुनौती मिलने लगी थी।
एक प्रसिद्ध अभिनेत्री लिलियन गिश ने यह सवाल खड़ा कर दिया था कि यह अभिनय शैली हास्यास्पद है। यदि आपको मरने का अभिनय करना पड़े, तब आप उसका चित्रण कैसे करेंगे? आपको तो मरने का कोई अनुभव नहीं है, फिर आप दृश्य में कैसे मरेंगे?
स्टेला एडलर को ऐसी कथित मैथड एक्टिंग में भारी गड़बड़ नजर आई, तो वह स्वयं लावस्की से पूछने के लिए पेरिस पहुंच गईं। तब तक लावस्की अपनी शैली और शिल्प में परिवर्तन कर चुके थे। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि हां, यह जरूरी नहीं कि केवल अपने अनुभव के आधार पर अभिनय किया जाए। अभिनेता दूसरों के अनुभवों से भी लाभ उठा सकता है। स्वयं को अलग-अलग परिस्थितियों में डालकर, अध्ययन-मनन करते हुए स्वयं को विकसित कर सकता है। कोई भी अभिनेता अपने अनुभव का विस्तार कभी न रोके और मात्र निर्देशक पर निर्भर न रहे, खुद को लगातार अपने व दूसरों के अनुभवों से मांजता रहे।
फिर क्या था? स्टेला एडलर ने अमेरिका लौटकर अपना अलग अभिनय स्कूल खोल लिया और अभिनय की अलग-अलग तकनीक पर काम करने लगीं। हालांकि, वह मूलत: लावस्की से प्रेरित रहीं।
बेशक, दुनिया आज भी लावस्की को आधुनिक अभिनय का पितामह मानती है।
क्रमश:








